Saturday, 26 July 2014

नौकरी की चिंता !

क्या आज हम युवा नौकरी के लिए कुछ ज्यादा ही परेशान नहीं रहते हैं ? चौबीस घंटे उसी कोल्हू-चक्कर में पड़े रह कर जीवन के शाश्वत नमक का स्वाद हम कहां ले पाते हैं ? आजीविका ही नहीं, थोड़ा जीवन के लिए भी सोचो। सब सामयिक ही नहीं, शाश्वत भी कुछ है। उसे जो नहीं देखता है, वह असार में ही जीवन को गंवा देता है। उसे संसार असार मालूम पड़ता है और जो असार है, उसमें ही वह अपना पूरा झूठा संसार निर्मित करता है।

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