सुभाषित सहस्र
सुभाषित
/ सूक्ति / उद्धरण / सुविचार /
पृथ्वी पर तीन रत्न हैं - जल, अन्न
और सुभाषित । लेकिन मूर्ख लोग पत्थर के टुकडों को ही रत्न कहते रहते हैं ।
— संस्कृत सुभाषित
— संस्कृत सुभाषित
विश्व के सर्वोत्कॄष्ट कथनों और
विचारों का ज्ञान ही संस्कृति है ।
— मैथ्यू अर्नाल्ड
— मैथ्यू अर्नाल्ड
संसार रूपी कटु-वृक्ष के केवल दो
फल ही अमृत के समान हैं ; पहला, सुभाषितों
का रसास्वाद और दूसरा, अच्छे लोगों की संगति ।
— चाणक्य
— चाणक्य
सही मायने में बुद्धिपूर्ण विचार
हजारों दिमागों में आते रहे हैं । लेकिन उनको अपना बनाने के लिये हमको ही उन पर
गहराई से तब तक विचार करना चाहिये जब तक कि वे हमारी अनुभूति में जड न जमा लें ।
— गोथे
— गोथे
मैं उक्तियों से घृणा करता हूँ ।
वह कहो जो तुम जानते हो ।
— इमर्सन
— इमर्सन
बुद्धिमानो की बुद्धिमता और बरसों
का अनुभव सुभाषितों में संग्रह किया जा सकता है।
— आईजक दिसराली
— आईजक दिसराली
—
मैं अक्सर खुद को उदृत
करता हुँ। इससे मेरे भाषण मसालेदार हो जाते हैं।
सुभाषितों की पुस्तक कभी पूरी नही
हो सकती।
— राबर्ट हेमिल्टन
— राबर्ट हेमिल्टन
कला
कला विचार को मूर्ति में
परिवर्तित कर देती है ।
कला एक प्रकार का एक नशा है, जिससे
जीवन की कठोरताओं से विश्राम मिलता है।
- फ्रायड
- फ्रायड
मेरे पास दो रोटियां हों और पास
में फूल बिकने आयें तो मैं एक रोटी बेचकर फूल खरीदना पसंद करूंगा। पेट खाली रखकर
भी यदि कला-दृष्टि को सींचने का अवसर हाथ लगता होगा तो मैं उसे गंवाऊगा नहीं।
- शेख सादी
- शेख सादी
कविता वह सुरंग है जिसमें से
गुज़र कर मनुष्य एक विश्व को छोड़ कर दूसरे विश्व में प्रवेश करता है ।
–रामधारी सिंह दिनकर
–रामधारी सिंह दिनकर
कलाकार प्रकृति का प्रेमी है अत:
वह उसका दास भी है और स्वामी भी ।
–रवीन्द्रनाथ ठाकुर
–रवीन्द्रनाथ ठाकुर
रंग में वह जादू है जो रंगने वाले, भीगने
वाले और देखने वाले तीनों के मन को विभोर कर देता है |
–मुक्ता
–मुक्ता
कविता गाकर रिझाने के लिए नहीं
समझ कर खो जाने के लिए है ।
— रामधारी सिंह दिनकर
— रामधारी सिंह दिनकर
कविता का बाना पहन कर सत्य और भी
चमक उठता है ।
— अज्ञात
— अज्ञात
कवि और चित्रकार में भेद है । कवि
अपने स्वर में और चित्रकार अपनी रेखा में जीवन के तत्व और सौंदर्य का रंग भरता है।
— डा रामकुमार वर्मा
— डा रामकुमार वर्मा
भाषा
/ स्वभाषा
निज भाषा उन्नति अहै, सब
भाषा को मूल ।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल ॥
— भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल ॥
— भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
जो एक विदेशी भाषा नहीं जानता , वह
अपनी भाषा की बारे में कुछ नही जानता ।
— गोथे
— गोथे
भाषा हमारे सोचने के तरीके को
स्वरूप प्रदान करती है और निर्धारित करती है कि हम क्या-क्या सोच सकते हैं ।
— बेन्जामिन होर्फ
— बेन्जामिन होर्फ
शब्द विचारों के वाहक हैं ।
शब्द पाकर दिमाग उडने लगता है ।
मेरी भाषा की सीमा , मेरी
अपनी दुनिया की सीमा भी है।
- लुडविग विटगेंस्टाइन
- लुडविग विटगेंस्टाइन
आर्थिक युद्ध का एक सूत्र है कि
किसी राष्ट्र को नष्ट करने के का सुनिश्चित तरीका है , उसकी
मुद्रा को खोटा कर देना । (और) यह भी उतना ही सत्य है कि किसी राष्ट्र की संस्कृति
और पहचान को नष्ट करने का सुनिश्चित तरीका है, उसकी भाषा को हीन बना देना ।
..(लेकिन) यदि विचार भाषा को
भ्रष्ट करते है तो भाषा भी विचारों को भ्रष्ट कर सकती है ।
— जार्ज ओर्वेल
— जार्ज ओर्वेल
शिकायत करने की अपनी गहरी
आवश्यकता को संतुष्ट करने के लिए ही मनुष्य ने भाषा ईजाद की है.
-– लिली टॉमलिन
-– लिली टॉमलिन
श्रीकृष्ण ऐसी बात बोले जिसके
शब्द और अर्थ परस्पर नपे-तुले रहे और इसके बाद चुप हो गए। वस्तुतः बड़े लोगों का
यह स्वभाव ही है कि वे मितभाषी हुआ करते हैं।
- शिशुपाल वध
- शिशुपाल वध
साहित्य
साहित्य समाज का दर्पण होता है ।
साहित्यसंगीतकला विहीन: साक्षात्
पशुः पुच्छविषाणहीनः ।
( साहित्य संगीत और कला से हीन पुरूष साक्षात् पशु ही है जिसके पूँछ और् सींग नहीं हैं । )
— भर्तृहरि
( साहित्य संगीत और कला से हीन पुरूष साक्षात् पशु ही है जिसके पूँछ और् सींग नहीं हैं । )
— भर्तृहरि
सच्चे साहित्य का निर्माण एकांत
चिंतन और एकान्त साधना में होता है |
–अनंत गोपाल शेवड़े
–अनंत गोपाल शेवड़े
साहित्य का कर्तव्य केवल ज्ञान
देना नहीं है , परंतु एक नया वातावरण देना भी है
।
— डा सर्वपल्ली राधाकृष्णन
— डा सर्वपल्ली राधाकृष्णन
संगति
/ सत्संगति / कुसंगति / मित्रलाभ / एकता / सहकार / सहयोग / नेटवर्किंग / संघ
संघे शक्तिः ( एकता में शति है )
हीयते हि मतिस्तात् , हीनैः
सह समागतात् ।
समैस्च समतामेति , विशिष्टैश्च विशिष्टितम् ॥
समैस्च समतामेति , विशिष्टैश्च विशिष्टितम् ॥
हीन लोगों की संगति से अपनी भी
बुद्धि हीन हो जाती है , समान लोगों के साथ रहने से समान
बनी रहती है और विशिष्ट लोगों की संगति से विशिष्ट हो जाती है ।
— महाभारत
— महाभारत
यानि कानि च मित्राणि, कृतानि
शतानि च ।
पश्य मूषकमित्रेण , कपोता: मुक्तबन्धना: ॥
पश्य मूषकमित्रेण , कपोता: मुक्तबन्धना: ॥
जो कोई भी हों , सैकडो
मित्र बनाने चाहिये । देखो, मित्र चूहे की सहायता से कबूतर
(जाल के) बन्धन से मुक्त हो गये थे ।
— पंचतंत्र
— पंचतंत्र
सत्संगतिः स्वर्गवास: ( सत्संगति
स्वर्ग में रहने के समान है )
संहतिः कार्यसाधिका । ( एकता से
कार्य सिद्ध होते हैं )
— पंचतंत्र
— पंचतंत्र
दुनिया के अमीर लोग नेटवर्क बनाते
हैं और उसकी तलाश करते हैं , बाकी सब काम की तलाश करते हैं ।
— कियोसाकी
— कियोसाकी
मानसिक शक्ति का सबसे बडा स्रोत
है - दूसरों के साथ सकारात्मक तरीके से विचारों का आदान-प्रदान करना ।
शठ सुधरहिं सतसंगति पाई ।
पारस परस कुधातु सुहाई ॥
— गोस्वामी तुलसीदास
पारस परस कुधातु सुहाई ॥
— गोस्वामी तुलसीदास
गगन चढहिं रज पवन प्रसंगा । ( हवा
का साथ पाकर धूल आकाश पर चढ जाता है )
— गोस्वामी तुलसीदास
— गोस्वामी तुलसीदास
बिना सहकार , नहीं
उद्धार ।
उतिष्ठ , जाग्रत्
, प्राप्य वरान् अनुबोधयत् ।
( उठो , जागो और श्रेष्ठ जनों को प्राप्त कर (स्वयं को) बुद्धिमान बनाओ । )
( उठो , जागो और श्रेष्ठ जनों को प्राप्त कर (स्वयं को) बुद्धिमान बनाओ । )
नहीं संगठित सज्जन लोग ।
रहे इसी से संकट भोग ॥
— श्रीराम शर्मा , आचार्य
रहे इसी से संकट भोग ॥
— श्रीराम शर्मा , आचार्य
सहनाववतु , सह
नौ भुनक्तु , सहवीर्यं करवाहहै ।
( एक साथ आओ , एक साथ खाओ और साथ-साथ काम करो )
( एक साथ आओ , एक साथ खाओ और साथ-साथ काम करो )
अच्छे मित्रों को पाना कठिन , वियोग
कष्टकारी और भूलना असम्भव होता है।
— रैन्डाल्फ
— रैन्डाल्फ
काजर की कोठरी में कैसे हू सयानो
जाय
एक न एक लीक काजर की लागिहै पै लागिहै।
—–अज्ञात
एक न एक लीक काजर की लागिहै पै लागिहै।
—–अज्ञात
जो रहीम उत्तम प्रकृती, का
करी सकत कुसंग
चन्दन विष व्यापत नही, लिपटे रहत भुजंग ।
— रहीम
चन्दन विष व्यापत नही, लिपटे रहत भुजंग ।
— रहीम
जिस तरह रंग सादगी को निखार देते
हैं उसी तरह सादगी भी रंगों को निखार देती है। सहयोग सफलता का सर्वश्रेष्ठ उपाय
है।
–मुक्ता
–मुक्ता
एकता का किला सबसे सुरक्षित होता
है। न वह टूटता है और न उसमें रहने वाला कभी दुखी होता है ।
–अज्ञात
–अज्ञात
संस्था
/ संगठन / आर्गनाइजेशन
दुनिया की सबसे बडी खोज (
इन्नोवेशन ) का नाम है - संस्था ।
आधुनिक समाज के विकास का इतिहास
ही विशेष लक्ष्य वाली संस्थाओं के विकास का इतिहास भी है ।
कोई समाज उतना ही स्वस्थ होता है
जितनी उसकी संस्थाएँ ; यदि संस्थायें विकास कर रही हैं
तो समाज भी विकास करता है, यदि वे क्षीण हो रही हैं तो समाज
भी क्षीण होता है ।
उन्नीसवीं शताब्दी की
औद्योगिक-क्रान्ति संस्थाओं की क्रान्ति थी ।
बाँटो और राज करो , एक
अच्छी कहावत है ; ( लेकिन ) एक होकर आगे बढो , इससे
भी अच्छी कहावत है ।
— गोथे
— गोथे
व्यक्तियों से राष्ट्र नही बनता , संस्थाओं
से राष्ट्र बनता है ।
— डिजरायली
— डिजरायली
साहस
/ निर्भीकता / पराक्रम/ आत्म्विश्वास / प्रयत्न
कबिरा मन निर्मल भया , जैसे
गंगा नीर ।
पीछे-पीछे हरि फिरै , कहत कबीर कबीर ॥
— कबीर
पीछे-पीछे हरि फिरै , कहत कबीर कबीर ॥
— कबीर
साहसे खलु श्री वसति । ( साहस में
ही लक्ष्मी रहती हैं )
इस बात पर संदेह नहीं करना चाहिये
कि विचारवान और उत्साही व्यक्तियों का एक छोटा सा समूह इस संसार को बदल सकता है ।
वास्तव मे इस संसार को इसने (छोटे से समूह) ही बदला है ।
जरूरी नही है कि कोई साहस लेकर
जन्मा हो , लेकिन हरेक शक्ति लेकर जन्मता है ।
बिना साहस के हम कोई दूसरा गुण भी
अनवरत धारण नहीं कर सकते । हम कृपालु, दयालु , सत्यवादी
, उदार या इमानदार नहीं बन सकते ।
बिना निराश हुए ही हार को सह लेना
पृथ्वी पर साहस की सबसे बडी परीक्षा है ।
— आर. जी. इंगरसोल
— आर. जी. इंगरसोल
जिस काम को करने में डर लगता है
उसको करने का नाम ही साहस है ।
मुट्ठीभर संकल्पवान लोग, जिनकी
अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं।
- महात्मा गांधी
- महात्मा गांधी
किसी की करुणा व पीड़ा को देख कर
मोम की तरह दर्याद्र हो पिघलनेवाला ह्रदय तो रखो परंतु विपत्ति की आंच आने पर
कष्टों-प्रतिकूलताओं के थपेड़े खाते रहने की स्थिति में चट्टान की तरह दृढ़ व ठोस
भी बने रहो।
- द्रोणाचार्य
- द्रोणाचार्य
यह सच है कि पानी में तैरनेवाले
ही डूबते हैं, किनारे पर खड़े रहनेवाले नहीं, मगर
ऐसे लोग कभी तैरना भी नहीं सीख पाते।
- वल्लभभाई पटेल
- वल्लभभाई पटेल
वस्तुतः अच्छा समाज वह नहीं है
जिसके अधिकांश सदस्य अच्छे हैं बल्कि वह है जो अपने बुरे सदस्यों को प्रेम के साथ
अच्छा बनाने में सतत् प्रयत्नशील है।
- डब्ल्यू.एच.आडेन
- डब्ल्यू.एच.आडेन
शोक मनाने के लिये नैतिक साहस
चाहिए और आनंद मनाने के लिए धार्मिक साहस। अनिष्ट की आशंका करना भी साहस का काम है, शुभ
की आशा करना भी साहस का काम परंतु दोनों में आकाश-पाताल का अंतर है। पहला गर्वीला
साहस है, दूसरा विनीत साहस।
- किर्केगार्द
- किर्केगार्द
किसी दूसरे को अपना स्वप्न बताने
के लिए लोहे का ज़िगर चाहिए होता है |
-– एरमा बॉम्बेक
-– एरमा बॉम्बेक
हर व्यक्ति में प्रतिभा होती है.
दरअसल उस प्रतिभा को निखारने के लिए गहरे अंधेरे रास्ते में जाने का साहस कम लोगों
में ही होता है.
कमाले बुजदिली है , पस्त
होना अपनी आँखों में ।
अगर थोडी सी हिम्मत हो तो क्या हो सकता नहीं ॥
— चकबस्त
अगर थोडी सी हिम्मत हो तो क्या हो सकता नहीं ॥
— चकबस्त
अपने को संकट में डाल कर कार्य
संपन्न करने वालों की विजय होती है। कायरों की नहीं।
–जवाहरलाल नेहरू
–जवाहरलाल नेहरू
जिन ढूढा तिन पाइयाँ , गहरे
पानी पैठि ।
मै बपुरा बूडन डरा , रहा किनारे बैठि ॥
— कबीर
मै बपुरा बूडन डरा , रहा किनारे बैठि ॥
— कबीर
वे ही विजयी हो सकते हैं जिनमें
विश्वास है कि वे विजयी होंगे ।
–अज्ञात
–अज्ञात
भय, अभय , निर्भय
तावत् भयस्य भेतव्यं , यावत्
भयं न आगतम् ।
आगतं हि भयं वीक्ष्य , प्रहर्तव्यं अशंकया ॥
आगतं हि भयं वीक्ष्य , प्रहर्तव्यं अशंकया ॥
भय से तब तक ही दरना चाहिये जब तक
भय (पास) न आया हो । आये हुए भय को देखकर बिना शंका के उस पर् प्रहार् करना चाहिये
।
— पंचतंत्र
— पंचतंत्र
जो लोग भय का हेतु अथवा हर्ष का
कारण उपस्थित होने पर भी विचार विमर्श से काम लेते हैं तथा कार्य की जल्दी से नहीं
कर डालते, वे कभी भी संताप को प्राप्त नहीं होते।
- पंचतंत्र
- पंचतंत्र
‘भय’
और ‘घृणा’ ये
दोनों भाई-बहन लाख बुरे हों पर अपनी मां बर्बरता के प्रति बहुत ही भक्ति रखते हैं।
जो कोई इनका सहारा लेना चाहता है, उसे ये सब से पहले अपनी मां के
चरणों में डाल जाते हैं।
- बर्ट्रेंड रसेल
- बर्ट्रेंड रसेल
मित्र से, अमित्र
से, ज्ञात से, अज्ञात से हम सब के लिए अभय हों।
रात्रि के समय हम सब निर्भय हों और सब दिशाओं में रहनेवाले हमारे मित्र बनकर रहें।
- अथर्ववेद
- अथर्ववेद
आदमी सिर्फ दो लीवर के द्वारा
चलता रहता है : डर तथा स्वार्थ |
-– नेपोलियन
-– नेपोलियन
डर सदैव अज्ञानता से पैदा होता है
|
-– एमर्सन
-– एमर्सन
अभय-दान सबसे बडा दान है ।
भय से ही दुख आते हैं, भय
से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयां उत्पन्न होती हैं ।
— विवेकानंद
— विवेकानंद
सत्य
/ सच्चाई / इमानदारी / असत्य
असतो मा सदगमय ।।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥
मृत्योर्मामृतम् गमय ॥
तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥
मृत्योर्मामृतम् गमय ॥
(हमको) असत्य से सत्य की ओर ले
चलो ।
अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो ।।
मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो ॥।
अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो ।।
मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो ॥।
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् , न
ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् ।
प्रियं च नानृतम् ब्रूयात् , एष धर्मः सनातन: ॥
प्रियं च नानृतम् ब्रूयात् , एष धर्मः सनातन: ॥
सत्य बोलना चाहिये, प्रिय
बोलना चाहिये, सत्य किन्तु अप्रिय नहीं बोलना
चाहिये ।
प्रिय किन्तु असत्य नहीं बोलना चाहिये ; यही सनातन धर्म है ॥
प्रिय किन्तु असत्य नहीं बोलना चाहिये ; यही सनातन धर्म है ॥
सत्य को कह देना ही मेरा मज़ाक
करने का तरीका है। संसार में यह सब से विचित्र मज़ाक है।
- जार्ज बर्नार्ड शॉ
- जार्ज बर्नार्ड शॉ
सत्य बोलना श्रेष्ठ है ( लेकिन )
सत्य क्या है , यही जानाना कठिन है ।
जो प्राणिमात्र के लिये अत्यन्त हितकर हो , मै इसी को सत्य कहता हूँ ।
— वेद व्यास
जो प्राणिमात्र के लिये अत्यन्त हितकर हो , मै इसी को सत्य कहता हूँ ।
— वेद व्यास
सही या गलत कुछ भी नहीं है – यह
तो सिर्फ सोच का खेल है.
पूरी इमानदारी से जो व्यक्ति अपना
जीविकोपार्जन करता है, उससे बढ़कर दूसरा कोई महात्मा
नहीं है।
- लिन यूतांग
- लिन यूतांग
झूट का कभी पीछा मत करो । उसे
अकेला छोड़ दो। वह अपनी मौत खुद मर जायेगा ।
- लीमैन बीकर
- लीमैन बीकर
नहिं असत्य सम पातकपुंजा। गिरि सम
होंहिं कि कोटिक गुंजा ।।
—–गोस्वामी तुलसीदास
—–गोस्वामी तुलसीदास
जो सत्य विषय हैं वे तो सबमें एक
से हैं झगड़ा झूठे विषयों में होता है ।
–सत्यार्थप्रकाश
–सत्यार्थप्रकाश
साँच बराबर तप नहीं , झूठ
बराबर पाप ।
— बबीर
— बबीर
अहिंसा
, हिंसा
, शांति
याद रखिए कि जब कभी आप युद्धरत
हों, पादरी, पुजारियों, स्त्रियों, बच्चों
और निर्धन नागरिकों से आपकी कोई शत्रुता नहीं है।
सच्ची शांति का अर्थ सिर्फ तनाव की समाप्ति नहीं है, न्याय की मौजूदगी भी है।
- मार्टिन सूथर किंग जूनियर
सच्ची शांति का अर्थ सिर्फ तनाव की समाप्ति नहीं है, न्याय की मौजूदगी भी है।
- मार्टिन सूथर किंग जूनियर
‘अहिंसा’ भय
का नाम भी नहीं जानती।
- महात्मा गांधी
- महात्मा गांधी
आंदोलन से विद्रोह नहीं पनपता
बल्कि शांति कायम रहती है।
- वेडेल फिलिप्स
- वेडेल फिलिप्स
‘हिंसा’ को
आप सर्वाधिक शक्ति संपन्न मानते हैं तो मानें पर एक बात निश्चित है कि हिंसा का
आश्रय लेने पर बलवान व्यक्ति भी सदा ‘भय’
से प्रताड़ित रहता है।
दूसरी ओर हमें तीन वस्तुओं की आवश्यकता हैः अनुभव करने के लिए ह्रदय की, कल्पना
करने के लिए मस्तिष्क की और काम करने के लिए हाथ की।
- स्वामी विवेकानंद
- स्वामी विवेकानंद
कस्र्णा में शीतल अग्नि होती है
जो क्रूर से क्रूर व्यक्ति का हृदय भी आर्द्र कर देती है ।
–सुदर्शन
–सुदर्शन
पाप, पुण्य, पवित्रता
जो पाप में पड़ता है, वह
मनुष्य है, जो उसमें पड़ने पर दुखी होता है,
वह साधु है और जो उस पर
अभिमान करता है, वह शैतान होता है।
- फुलर
- फुलर
अतिथि
मछली एवं अतिथि , तीन
दिनों के बाद दुर्गन्धजनक और अप्रिय लगने लगते हैं ।
— बेंजामिन फ्रैंकलिन
— बेंजामिन फ्रैंकलिन
अतिथि देवो भव ।
( अतिथि को देवता समझो । )
( अतिथि को देवता समझो । )
सच्ची मित्रता का नियम है कि जाने
वाले मेहमान को जल्दी बिदा करो और आने वाले का स्वागत करो ।
संस्कृति
आंशिक संस्कृति श्रृंगार की ओर
दौडती है , अपरिमित संस्कृति सरलता की ओर ।
— बोबी
— बोबी
संस्कृति उस दृष्टिकोण को कहते है
जिससे कोई समुदाय विशेष जीवन की समस्याओं पर दृष्टि निक्षेप करता है ।
— डा. सम्पूर्णानन्द
— डा. सम्पूर्णानन्द
गुण
/ सदगुण / अवगुण
सौरज धीरज तेहि रथ चाका , सत्य
शील डृढ ध्वजा पताका ।
बल बिबेक दम परहित घोरे , क्षमा कृपा समता रिजु जोरे ॥
— तुलसीदास
बल बिबेक दम परहित घोरे , क्षमा कृपा समता रिजु जोरे ॥
— तुलसीदास
आकाश-मंडल में दिवाकर के उदित
होने पर सारे फूल खिल जाते हैं, इस में आश्चर्य ही क्या? प्रशंसनीय
है तो वह हारसिंगार फूल (शेफाली) जो घनी आधी रात में भी फूलता है।
- आर्यान्योक्तिशतक
- आर्यान्योक्तिशतक
आलसी सुखी नहीं हो सकता, निद्रालु
ज्ञानी नहीं हो सकता, मम्त्व रखनेवाला वैराग्यवान नहीं
हो सकता और हिंसक दयालु नहीं हो सकता।
- भगवान महावीर
- भगवान महावीर
कलाविशेष में निपुण भले ही चित्र
में कितने ही पुष्प बना दें पर क्या वे उनमें सुगंध पा सकते हैं और फिर भ्रमर उनसे
रस कैसे पी सकेंगे।
- पंडितराज जगन्नाथ
- पंडितराज जगन्नाथ
कुलीनता यही है और गुणों का
संग्रह भी यही है कि सदा सज्जनों से सामने विनयपूर्वक सिर झुक जाए।
- दर्पदलनम् १।२९
- दर्पदलनम् १।२९
गुणवान पुरुषों को भी अपने स्वरूप
का ज्ञान दूसरे के द्वारा ही होता है। आंख अपनी सुन्दरता का दर्शन दर्पण में ही कर
सकती है।
- वासवदत्ता
- वासवदत्ता
घमंड करना जाहिलों का काम है।
- शेख सादी
- शेख सादी
तुम प्लास्टिक सर्जरी करवा सकते
हो, तुम सुन्दर चेहरा बनवा सकते हो, सुंदर आंखें सुंदर नाक, तुम
अपनी चमड़ी बदलवा सकते हो, तुम अपना आकार बदलवा सकते हो। इससे
तुम्हारा स्वभाव नहीं बदलेगा। भीतर तुम लोभी बने रहोगे, वासना
से भरे रहोगे, हिंसा, क्रोध, ईर्ष्या, शक्ति
के प्रति पागलपन भरा रहेगा। इन बातों के लिये प्लास्टिक सर्जन कुछ कर नहीं सकता।
- ओशो
- ओशो
मैं कोयल हूं और आप कौआ हैं-हम
दोनों में कालापन तो समान ही है किंतु हम दोनों में जो भेद है, उसे
वे ही जानते हैं जो कि ‘काकली’ (स्वर-माधुरी) की पहचान रखते हैं।
- साहित्यदर्पण
- साहित्यदर्पण
यदि राजा किसी अवगुण को पसंद करने
लगे तो वह गुण हो जाता है |
-– शेख़ सादी
-– शेख़ सादी
बुद्धिमान किसी का उपहास नहीं
करते हैं.
नम्रता सारे गुणों का दृढ़ स्तम्भ
है.
दूसरों का जो आचरण तुम्हें पसंद
नहीं , वैसा आचरण दूसरों के प्रति न करो.
जीवन की जड़ संयम की भूमि में
जितनी गहरी जमती है और सदाचार का जितना जल दिया जाता है उतना ही जीवन हरा भरा होता
है और उसमें ज्ञान का मधुर फल लगता है।
— दीनानाथ दिनेश
— दीनानाथ दिनेश
जिस तरह जौहरी ही असली हीरे की
पहचान कर सकता है, उसी तरह गुणी ही गुणवान् की पहचान
कर सकता है |
– कबीर
– कबीर
गहरी नदी का जल प्रवाह शांत व
गंभीर होता है |
– शेक्सपीयर
– शेक्सपीयर
कुल की प्रशंसा करने से क्या लाभ? शील
ही (मनुष्य की पहचान का) मुख्य कारण है। क्षुद्र मंदार आदि के वृक्ष भी उत्तम खेत
में पड़ने से अधिक बढते-फैलते हैं।
- मृच्छकटिक
- मृच्छकटिक
सभी लोगों के स्वभाव की ही
परिक्षा की जाती है, गुणों की नहीं। सब गुणों की
अपेक्षा स्वभाव ही सिर पर चढ़ा रहता है (क्योंकि वही सर्वोपरिहै)।
- हितोपदेश
- हितोपदेश
पुष्प की सुगंध वायु के विपरीत
कभी नहीं जाती लेकिन मानव के सदगुण की महक सब ओर फैल जाती है ।
–गौतम बुद्ध
–गौतम बुद्ध
संयम
/ त्याग / सन्यास / वैराग्य
संयम संस्कृति का मूल है।
विलासिता निर्बलता और चाटुकारिता के वातावरण में न तो संस्कृति का उद्भव होता है
और न विकास ।
— काका कालेलकर
— काका कालेलकर
ताती पाँव पसारियो जेती चादर होय.
भोग और त्याग की शिक्षा बाज़ से
लेनी चाहिए। बाज़ पक्षी से जब कोई उसके हक का मांस छीन लेता है तो मरणांतक दुख का
अनुभव करता है किंतु जब वह अपनी इच्छा से ही अन्य पक्षियों के लिए अपने हिस्से का
मांस, जैसाकि उसका स्वभाव होता है, त्याग देता है तो वह पर सुख का
अनुभव करता है। यानि सारा खेल इच्छा , आसक्ति अथवा अपने मन का है।
- सांख्य दर्शन
- सांख्य दर्शन
भोगविलास ही जिनके जीवन का
प्रयोजन
आलसी, असंयत करें अत्यधिक भोजन।
मार करता है इन निर्बलों की तवाही
करे कृश वृक्ष को ज्यों पवन धराशाई।।
—-गौतम बुद्ध (धम्मपद ७)
आलसी, असंयत करें अत्यधिक भोजन।
मार करता है इन निर्बलों की तवाही
करे कृश वृक्ष को ज्यों पवन धराशाई।।
—-गौतम बुद्ध (धम्मपद ७)
संयम और श्रम मानव के दो
सर्वोत्तम चिकित्सक हैं । श्रम से भूख तेज होती है और संयम अतिभोग को रोकता है ।
— रूसो
— रूसो
नाव जल में रहे लेकिन जल नाव में
नहीं रहना चाहिये, इसी प्रकार साधक जग में रहे लेकिन
जग साधक के मन में नहीं रहना चाहिये ।
— रामकृष्ण परमहंस
— रामकृष्ण परमहंस
महान कार्य महान त्याग से ही
सम्पन्न होते हैं ।
— स्वामी विवेकानन्द
— स्वामी विवेकानन्द
परोपकार
/ कृतज्ञता / आभार / प्रत्युपकार
परहित सरसि धरम नहि भाई ।
— गो. तुलसीदास
— गो. तुलसीदास
अष्टादस पुराणेषु , व्यासस्य
वचनं द्वयम् ।
परोपकारः पुण्याय , पापाय परपीडनम् ॥
परोपकारः पुण्याय , पापाय परपीडनम् ॥
अट्ठारह पुराणों में व्यास जी ने
केवल दो बात कही है ; दूसरे का उपकार करने से पुण्य
मिलता है और दूसरे को पीडा देने से पाप ।
पिबन्ति नद्यः स्वमेय नोदकं , स्वयं
न खादन्ति फलानि वृक्षाः ।
धाराधरो वर्षति नात्महेतवे , परोपकाराय सतां विभूतयः ।।
——-अज्ञात
(नदियाँ स्वयं अपना पानी नहीं पीती हैं। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं। बादल अपने लिये वर्षा नहीं करते हैं। सन्तों का का धन परोपकार के लिये होता है ।)
धाराधरो वर्षति नात्महेतवे , परोपकाराय सतां विभूतयः ।।
——-अज्ञात
(नदियाँ स्वयं अपना पानी नहीं पीती हैं। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं। बादल अपने लिये वर्षा नहीं करते हैं। सन्तों का का धन परोपकार के लिये होता है ।)
जिसने कुछ एसहाँ किया , एक
बोझ हम पर रख दिया ।
सर से तिनका क्या उतारा , सर
पर छप्पर रख दिया ॥
— चकबस्त
— चकबस्त
समाज के हित में अपना हित है ।
— श्रीराम शर्मा , आचार्य
— श्रीराम शर्मा , आचार्य
जिस हरे-भरे वृक्ष की छाया का आश्रय
लेकर रहा जाए, पहले उपकारों का ध्यान रखकर उसके
एक पत्ते से भी द्रोह नहीं करना चाहिए।
- महाभारत
- महाभारत
नेकी कर और दरिया में डाल।
—-किस्सा हातिमताई(?)
—-किस्सा हातिमताई(?)
प्रेम
/ प्यार / घॄणा
उस मनुष्य का ठाट-बाट जिसे लोग
प्यार नहीं करते, गांव के बीचोबीच उगे विषवृक्ष के
समान है।
- तिरुवल्लुवर
- तिरुवल्लुवर
जो अकारण अनुराग होता है उसकी
प्रतिक्रिया नहीं होती है क्योंकि वह तो स्नेहयुक्त सूत्र है जो प्राणियों को
भीतर-ही-भीतर (ह्रदय में) सी देती है।
- उत्तररामचरित
- उत्तररामचरित
पुरुष के लिए प्रेम उसके जीवन का
एक अलग अंग है पर स्त्री के लिए उसका संपूर्ण अस्तित्व है।
- लार्ड बायरन
- लार्ड बायरन
रहिमन धागा प्रेम का , मत
तोड़ो चिटकाय।
तोड़े से फिर ना जुड़ै , जुड़े गाँठ पड़ि जाय।।
—-रहीम
तोड़े से फिर ना जुड़ै , जुड़े गाँठ पड़ि जाय।।
—-रहीम
पोथी पढि पढि जग मुआ , पंडित
भया न कोय ।
ढाई अक्षर प्रेम का पढे , सो पंडित होय ॥
ढाई अक्षर प्रेम का पढे , सो पंडित होय ॥
क्षमा
/ बदला
क्षमा बडन को चाहिये , छोटन
को उतपात ।
का शम्भु को घट गयो , जो भृगु मारी लात ॥
— रहीम
का शम्भु को घट गयो , जो भृगु मारी लात ॥
— रहीम
सबसे उत्तम बदला क्षमा करना है.
— रवीन्द्रनाथ ठाकुर
— रवीन्द्रनाथ ठाकुर
दुष्टो का बल हिन्सा है, शासको
का बल शक्ती है,स्त्रीयों का बल सेवा है और
गुणवानो का बल क्षमा है ।
क्षमा शोभती उस भुजंग को , जिसके
पास गरल हो ।
— रामधारी सिंह दिनकर
— रामधारी सिंह दिनकर
सदाचार
सदाचार , शिष्टाचार
से अधिक महत्वपूर्ण है ।
लज्जा
/ शर्म / हया
यदि कोई लडकी लज्जा का त्याग कर
देती है तो अपने सौन्दर्य का सबसे बडा आकर्षण खो देती है ।
— सेंट ग्रेगरी
— सेंट ग्रेगरी
धनधान्यप्रयोगेषु
विद्यासंग्रहणेषु च ।
आहारे व्यवहारे च , त्यक्तलज्जः सुखी भवेत ॥
आहारे व्यवहारे च , त्यक्तलज्जः सुखी भवेत ॥
( धन-धान्य के लेन-देन में , विद्या
के उपार्जन में , भोजन करने में और व्यवहार मे
लज्जा-सम्कोच न करने वाला सुखी रहता है । )
जीवन-दर्शन
येषां न विद्या न तपो न दानं , ज्ञानं
न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः , मनुष्यरूपे मृगाश्चरन्ति ॥
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः , मनुष्यरूपे मृगाश्चरन्ति ॥
जिसके पास न विद्या है, न
तप है, न दान है , न ज्ञान है , न
शील है , न गुण है और न धर्म है ;
वे मृत्युलोक पृथ्वी पर
भार होते है और मनुष्य रूप तो हैं पर पशु की तरह चरते हैं (जीवन व्यतीत करते हैं )
।
— भर्तृहरि
— भर्तृहरि
मनुष्य कुछ और नहीं , भटका
हुआ देवता है ।
— श्रीराम शर्मा , आचार्य
— श्रीराम शर्मा , आचार्य
हर दिन नया जन्म समझें , उसका
सदुपयोग करें ।
— श्रीराम शर्मा , आचार्य
— श्रीराम शर्मा , आचार्य
मानव तभी तक श्रेष्ठ है , जब
तक उसे मनुष्यत्व का दर्जा प्राप्त है । बतौर पशु ,
मानव किसी भी पशु से
अधिक हीन है।
— रवीन्द्र नाथ टैगोर
— रवीन्द्र नाथ टैगोर
आदर्श के दीपक को , पीछे
रखने वाले , अपनी ही छाया के कारण , अपने
पथ को , अंधकारमय बना लेते हैं।
— रवीन्द्र नाथ टैगोर
— रवीन्द्र नाथ टैगोर
क्लोज़-अप में जीवन एक त्रासदी
(ट्रेजेडी) है, तो लंबे शॉट में प्रहसन (कॉमेडी) |
-– चार्ली चेपलिन
-– चार्ली चेपलिन
आपके जीवन की खुशी आपके विचारों
की गुणवत्ता पर निर्भर करती है |
-– मार्क ऑरेलियस अन्तोनियस
-– मार्क ऑरेलियस अन्तोनियस
हमेशा बत्तख की तरह व्यवहार रखो.
सतह पर एकदम शांत , परंतु सतह के नीचे दीवानों की तरह
पैडल मारते हुए |
-– जेकब एम ब्रॉदे
-– जेकब एम ब्रॉदे
जैसे जैसे हम बूढ़े होते जाते हैं, सुंदरता
भीतर घुसती जाती है |
-– रॉल्फ वाल्डो इमर्सन
-– रॉल्फ वाल्डो इमर्सन
अव्यवस्था से जीवन का प्रादुर्भाव
होता है , तो अनुक्रम और व्यवस्थाओं से आदत |
-– हेनरी एडम्स
-– हेनरी एडम्स
दृढ़ निश्चय ही विजय है
जब आपके पास कोई पैसा नहीं होता
है तो आपके लिए समस्या होती है भोजन का जुगाड़. जब आपके पास पैसा आ जाता है तो
समस्या सेक्स की हो जाती है. जब आपके पास दोनों चीज़ें हो जाती हैं तो स्वास्थ्य
समस्या हो जाती है. और जब सारी चीज़ें आपके पास होती हैं, तो
आपको मृत्यु भय सताने लगता है.
-– जे पी डोनलेवी
-– जे पी डोनलेवी
दुनिया में सिर्फ दो सम्पूर्ण
व्यक्ति हैं – एक मर चुका है, दूसरा
अभी पैदा नहीं हुआ है.
प्रसिद्धि व धन उस समुद्री जल के
समान है, जितना ज्यादा हम पीते हैं, उतने ही प्यासे होते जाते हैं.
हम जानते हैं कि हम क्या हैं, पर
ये नहीं जानते कि हम क्या बन सकते हैं.
- - शेक्सपीयर
- - शेक्सपीयर
दूब की तरह छोटे बनकर रहो. जब
घास-पात जल जाते हैं तब भी दूब जस की तस बनी रहती है |
– गुरु नानक देव
– गुरु नानक देव
ठोकर लगती है और दर्द होता है तभी
मनुष्य सीख पाता है |
-– महात्मा गांधी
-– महात्मा गांधी
मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका
अज्ञान है |
-– चाणक्य
-– चाणक्य
जीवन एक रहस्य है, जिसे
जिया न जा सकता है, जी कर जाना भी जा सकता है लेकिन
गणित के प्रश्नों की भांति उसे हल नहीं किया जा सकता। वह सवाल नहीं - एक चुनौती है, एक
अभियान है।
- ओशो
- ओशो
मेरी समझ में मनुष्य का व्यक्तिगत
अस्तित्व एक नदी की तरह का होना चाहिए। नदी प्रारंभ में बहुत पतली होती है।
पत्थरों, चट्टानों, झरनों को पार करके मैदान में आती
है, एक क्रम से उसका विस्तार होता है,
फिर भी बड़ी मन्थर गति
से बहती है और बिना क्रम भंग किये अंत में समुद्र में विलीन हो जाती है। समुद्र
में अपने अस्तित्व को समाप्त करते समय वह किसी भी प्रकार की पीड़ा का अनुभव नहीं
करती जो वृद्ध परुष जीवन को इस रूप में देखता है,
मृत्यु के भय से मुक्त
रहता है।
- बर्ट्रेंड रसेल
- बर्ट्रेंड रसेल
कबिरा यह तन खेत है, मन, बच, करम
किसान।
पाप, पुन्य दुइ बीज हैं, जोतैं, बवैं सुजान।।
—-सन्त कबीर
पाप, पुन्य दुइ बीज हैं, जोतैं, बवैं सुजान।।
—-सन्त कबीर
विषयों का चिंतन करने वाले मनुष्य
की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती
है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मूढ़ता और बुद्धि
भ्रष्टता उत्पन्न होती है। बुद्धि के भ्रष्ट होने से स्मरण-शक्ति विलुप्त हो जाती
है, यानी ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है। और जब बुद्धि तथा स्मृति का
विनाश होता है, तो सब कुछ नष्ट हो जाता है।
–गीता (अध्याय 2/62, 63)
–गीता (अध्याय 2/62, 63)
विवेक जीवन का नमक है और कल्पना
उसकी मिठास । एक जीवन को सुरक्षित रखता है और दूसरा उसे मधुर बनाता है ।
–अज्ञात
–अज्ञात
मेहनत करने से दरिद्रता नहीं रहती, धर्म
करने से पाप नहीं रहता, मौन रहने से कलह नहीं होता और
जागते रहने से भय नहीं होता |
–चाणक्य
–चाणक्य
आपत्तियां मनुष्यता की कसौटी हैं
। इन पर खरा उतरे बिना कोई भी व्यक्ति सफल नहीं हो सकता ।
–पं रामप्रताप त्रिपाठी
–पं रामप्रताप त्रिपाठी
कष्ट और विपत्ति मनुष्य को शिक्षा
देने वाले श्रेष्ठ गुण हैं। जो साहस के साथ उनका सामना करते हैं, वे
विजयी होते हैं ।
–लोकमान्य तिलक
–लोकमान्य तिलक
प्रकृति, समय
और धैर्य ये तीन हर दर्द की दवा हैं ।
— अज्ञात
— अज्ञात
जैसे जल द्वारा अग्नि को शांत
किया जाता है वैसे ही ज्ञान के द्वारा मन को शांत रखना चाहिये |
— वेदव्यास
— वेदव्यास
जो अपने ऊपर विजय प्राप्त करता है
वही सबसे बड़ा विजयी हैं ।
–गौतम बुद्ध
–गौतम बुद्ध
वही उन्नति करता है जो स्वयं अपने
को उपदेश देता है। -स्वामी रामतीर्थ
अपने विषय में कुछ कहना
प्राय:बहुत कठिन हो जाता है क्योंकि अपने दोष देखना आपको अप्रिय लगता है और उनको
अनदेखा करना औरों को ।
–महादेवी वर्मा
–महादेवी वर्मा
जैसे अंधे के लिये जगत अंधकारमय
है और आंखों वाले के लिये प्रकाशमय है वैसे ही अज्ञानी के लिये जगत दुखदायक है और
ज्ञानी के लिये आनंदमय |
— सम्पूर्णानंद
— सम्पूर्णानंद
बाधाएं व्यक्ति की परीक्षा होती
हैं। उनसे उत्साह बढ़ना चाहिये, मंद नहीं पड़ना चाहिये ।
— यशपाल
— यशपाल
कष्ट ही तो वह प्रेरक शक्ति है जो
मनुष्य को कसौटी पर परखती है और आगे बढाती है ।
— सावरकर
— सावरकर
नीति
/ लोकनीति / नय / व्यवहार कौशल
कौन हमदर्द किसका है जहां में
अकबर ।
इक उभरता है यहाँ एक के मिट जाने से ॥
— अकबर इलाहाबादी
इक उभरता है यहाँ एक के मिट जाने से ॥
— अकबर इलाहाबादी
हथौड़ा कांच को तो तोड़ देता है, परंतु
लोहे को रूप देता है.
तलवारों तथा बंदूकों की आँखें
नहीं होती हैं.
मुट्ठियां बाँध कर आप किसी से हाथ
नहीं मिला सकते |
-– इंदिरा गांधी
-– इंदिरा गांधी
कांटों को मुरझाने का डर नहीं
सताता.
रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिये
डारि।
जहाँ काम आवै सुई काह करै तरवारि।।
—–रहीम
जहाँ काम आवै सुई काह करै तरवारि।।
—–रहीम
कह रहीम सम्पत्ति सगे , मिलत
बहुत बहु रीति ।
बिपति-कसौटी जे कसै , सोई साँचे मीत ॥
बिपति-कसौटी जे कसै , सोई साँचे मीत ॥
कह रहीम कैसे निभै , बेर
केर को संग ।
वे दोलत रस आपने , उनके फाटत अंग ॥
वे दोलत रस आपने , उनके फाटत अंग ॥
बसि कुसंग चाहत कुशल , यह
रहीम जिय सोस ।
महिमा घटी समुद्र की , रावन बस्या परोस ॥
महिमा घटी समुद्र की , रावन बस्या परोस ॥
खैर खून खाँसी खुशी , बैर
प्रीति मद पान ।
रहिमन दाबे ना दबे , जानत सकल जहान ॥
रहिमन दाबे ना दबे , जानत सकल जहान ॥
बिगरी बात बने नहीं , लाख
करो किन कोय ।
रहिमन फाटै दूध को , मथे न माखन होय ॥
रहिमन फाटै दूध को , मथे न माखन होय ॥
केवल वीरता से नहीं , नीतियुक्त
वीरता से जय होती है । अन्य वस्तु के साथ मिलाकर विष खाने से लाभ होता है , लेकिन
अकेले खाने से मरण ।
बलीयसा समाक्रान्तो वैंतसीं
वृतिमाचरेत ।
— पंचतन्त्र
( बलवान से आक्रान्त होने पर मनुष्य को बेंत की रीति-नीति का अनुपालन करना चाहिये, अर्थात नम्र हो जाना चाहिये । )
— पंचतन्त्र
( बलवान से आक्रान्त होने पर मनुष्य को बेंत की रीति-नीति का अनुपालन करना चाहिये, अर्थात नम्र हो जाना चाहिये । )
कुल की प्रतिष्ठा भी विनम्रता और सदव्यवहार
से होती है, हेकड़ी और स्र्आब दिखाने से नहीं
।
— प्रेमचंद
— प्रेमचंद
आंख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम
के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ
नहीं दिखता और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता ।
–चाणक्य
–चाणक्य
जहां प्रकाश रहता है वहां अंधकार
कभी नहीं रह सकता ।
— माघ्र
— माघ्र
जो दीपक को अपने पीछे रखते हैं वे
अपने मार्ग में अपनी ही छाया डालते हैं ।
–रवीन्द्र
–रवीन्द्र
जहाँ अकारण अत्यन्त सत्कार हो , वहाँ
परिणाम में दुख की आशंका करनी चाहिये ।
— कुमार सम्भव
— कुमार सम्भव
लक्ष्य
/ उद्देश्य / ध्येय
यदि आपको रास्ते का पता नहीं है, तो
जरा धीरे चलें |
महान ध्येय ( लक्ष्य ) महान
मस्तिष्क की जननी है ।
— इमन्स
— इमन्स
जीवन में कोई चीज़ इतनी हानिकारक
और ख़तरनाक नहीं जितना डांवांडोल स्थिति में रहना ।
— सुभाषचंद्र बोस!
— सुभाषचंद्र बोस!
जीवन का महत्व तभी है जब वह किसी
महान ध्येय के लिये समर्पित हो । यह समर्पण ज्ञान और न्याययुक्त हो ।
–इंदिरा गांधी
–इंदिरा गांधी
विफलता नहीं , बल्कि
दोयम दर्जे का लक्ष्य एक अपराध है ।
इच्छा
/ कामना / मनोरथ / महत्वाकाँक्षा / चाह / सपने देखना
मनुष्य की इच्छाओं का पेट आज तक
कोई नहीं भर सका है |
– वेदव्यास
– वेदव्यास
इच्छा ही सब दुःखों का मूल है |
-– बुद्ध
-– बुद्ध
भ्रमरकुल आर्यवन में ऐसे ही कार्य
(मधुपान की चाह) के बिना नहीं घूमता है। क्या बिना अग्नि के धुएं की शिखा कभी
दिखाई देती है?
- गाथासप्तशती
- गाथासप्तशती
स्वप्न वही देखना चाहिए, जो
पूरा हो सके ।
–आचार्य तुलसी
–आचार्य तुलसी
माया मरी न मन मरा , मर
मर गये शरीर ।
आशा तृष्ना ना मरी , कह गये दास कबीर ॥
— कबीर
आशा तृष्ना ना मरी , कह गये दास कबीर ॥
— कबीर
सन्तान
/ पुत्र
पूत सपूत त का धन संचय , पूत
कपूत त का धन संचय ।
अजात्मृतमूर्खेभ्यो मृताजातौ सुतौ
वरम् ।
यतः तौ स्वल्प दुखाय, जावज्जीवं जडो दहेत् ॥
— पंचतन्त्र
( अजात् ( जो पैदा ही नहीं हुआ ) , मृत और मूर्ख - इन तीन तरह के पुत्रों मे से अजात और मृत पुत्र अधिक श्रेष्ठ हैं , क्योंकि अजात और मृत पुत्र अल्प दुख ही देते हैं । किन्तु मूर्ख पुत्र जब तक जीवन है तब तक जलाता रहता है । )
यतः तौ स्वल्प दुखाय, जावज्जीवं जडो दहेत् ॥
— पंचतन्त्र
( अजात् ( जो पैदा ही नहीं हुआ ) , मृत और मूर्ख - इन तीन तरह के पुत्रों मे से अजात और मृत पुत्र अधिक श्रेष्ठ हैं , क्योंकि अजात और मृत पुत्र अल्प दुख ही देते हैं । किन्तु मूर्ख पुत्र जब तक जीवन है तब तक जलाता रहता है । )
माता शत्रुः पिता बैरी , येन
बालो न पाठितः ।
सभामध्ये न शोभते , हंसमध्ये बको यथा ॥
जिसने बालक को नहीं पढाया वह माता शत्रु है और पिता बैरी है ।
(क्योंकि) सभा में वह (बालक) ऐसे ही शोभा नहीं पाता जैसे हंसों के बीच बगुला ।
सभामध्ये न शोभते , हंसमध्ये बको यथा ॥
जिसने बालक को नहीं पढाया वह माता शत्रु है और पिता बैरी है ।
(क्योंकि) सभा में वह (बालक) ऐसे ही शोभा नहीं पाता जैसे हंसों के बीच बगुला ।
दो बच्चों से खिलता उपवन ।
हँसते-हँसते कटता जीवन ।।
हँसते-हँसते कटता जीवन ।।
धरती पर है स्वर्ग कहां – छोटा
है परिवार जहाँ.
जिस तरह एक दीपक पूरे घर का
अंधेरा दूर कर देता है उसी तरह एक योग्य पुत्र सारे कुल का दरिद्र दूर कर देता है |
–कहावत
–कहावत
पालन-पोषण
/ पैरेन्टिग
किसी बालक की क्षमताओं को नष्ट
करना हो तो उसे रटने में लगा दो ।
— बिनोवा भावे
— बिनोवा भावे
बुद्धिमान पिता वह है जो अपने
बच्चों को जाने.
स्वाधीनता
/ स्वतन्त्रता / पराधीनता
पराधीन सपनेहु सुख नाहीं ।
— गोस्वामी तुलसीदास
— गोस्वामी तुलसीदास
आर्थिक स्वतन्त्रता से ही
वास्तविक स्वतन्त्रता आती है ।
आजादी मतलब जिम्मेदारी। तभी लोग
उससे घबराते हैं।
— जार्ज बर्नाड शॉ
— जार्ज बर्नाड शॉ
स्वतंत्र वही हो सकता है जो अपना
काम अपने आप कर लेता है।
–विनोबा
–विनोबा
जंजीरें, जंजीरें
ही हैं, चाहे वे लोहे की हों या सोने की,
वे समान रूप से तुम्हें
गुलाम बनाती हैं ।
–स्वामी रामतीर्थ
–स्वामी रामतीर्थ
नरक क्या है ? पराधीनता ।
— आदि शंकराचार्य
— आदि शंकराचार्य
आडम्बर, ढकोसला, ढोंग , पाखण्ड , वास्तविकता / हाइपोक्रिसी
माला तो कर में फिरै , जीभ
फिरै मुख माँहि ।
मनवा तो चहु दिश फिरै , ये तो सुमिरन नाहिं ॥
— कबीर
मनवा तो चहु दिश फिरै , ये तो सुमिरन नाहिं ॥
— कबीर
दिन में रोजा करत है , रात
हनत है गाय ।
— कबीर
— कबीर
चिड़ियों की तरह हवा में उड़ना और
मछलियों की तरह पानी में तैरना सीखने के बाद अब हमें इन्सानों की तरह ज़मीन पर
चलना सीखना है।
- सर्वपल्ली राधाकृष्णन
- सर्वपल्ली राधाकृष्णन
हिन्दुस्तान का आदमी बैल तो पाना
चाहता है लेकिन गाय की सेवा करना नहीं चाहता। वह उसे धार्मिक दृष्टि से पूजन का
स्वांग रचता है लेकिन दूध के लिये तो भैंस की ही कद्र करता है। हिन्दुस्तान के लोग
चाहते हैं कि उनकी माता तो रहे भैंस और पिता हो बैल। योजना तो ठीक है लेकिन वह
भगवान को मंजूर नहीं है।
- विनोबा
- विनोबा
भारतीय संस्कृति और धर्म के नाम
पर लोगों को जो परोसा जा रहा है वह हमें धर्म के अपराधीकरण की ओर ले जा रहा है।
इसके लिये पंडे, पुजारी, पादरी, महंत, मौलवी, राजनेता
आदि सभी जिम्मेदार हैं। ये लोग धर्म के नाम पर नफरत की दुकानें चलाकर समाज को
बांटने का काम कर रहे हैं।
- स्वामी रामदेव
- स्वामी रामदेव
पत्रकारिता में पच्चीस साल के
अनुभव के बाद मैं एक बात निश्चित रूप से जानती हूं कि सत्य को दफ़नाया जा सकता है, उसकी
हत्या नहीं की जा सकती। सत्य कब्र से भी उठकर सामने आ जाता है और उनके पीछे भूत की
तरह लग जाता है जिन्होंने उसे दफ़न करने की साज़िश की थी।
- अनीता प्रताप
- अनीता प्रताप
बकरियों की लड़ाई, मुनि
के श्राद्ध, प्रातःकाल की घनघटा तथा पति-पत्नी
के बीच कलह में प्रदर्शन अधिक और वास्तविकता कम होती है।
- नीतिशास्त्र
- नीतिशास्त्र
पर उपदेश कुशल बहुतेरे ।
जे आचरहिं ते नर न घनेरे ।।
—- गोस्वामी तुलसीदास
जे आचरहिं ते नर न घनेरे ।।
—- गोस्वामी तुलसीदास
ईश्वर ने तुम्हें सिर्फ एक चेहरा
दिया है और तुम उस पर कई चेहरे चढ़ा लेते हो.
जो व्यक्ति सोने का बहाना कर रहा
है उसे आप उठा नहीं सकते |
-– नवाजो
-– नवाजो
जब तुम्हारे खुद के दरवाजे की
सीढ़ियाँ गंदी हैं तो पड़ोसी की छत पर पड़ी गंदगी का उलाहना मत दीजिए |
-– कनफ़्यूशियस
-– कनफ़्यूशियस
सोचना, कहना
व करना सदा समान हो.
नेकी से विमुख हो जाना और बदी
करना नि:संदेह बुरा है, मगर सामने हंस कर बोलना और पीछे
चुगलखोरी करना उससे भी बुरा है ।
–संत तिस्र्वल्लुवर
–संत तिस्र्वल्लुवर
पुस्तकें
सही किताब वह नहीं है जिसे हम
पढ़ते हैं – सही किताब वह है जो हमें पढ़ता है
|
— डबल्यू एच ऑदेन
— डबल्यू एच ऑदेन
पुस्तक एक बग़ीचा है जिसे जेब में
रखा जा सकता है.
किताबों को नहीं पढ़ना किताबों को
जलाने से बढ़कर अपराध है |
-– रे ब्रेडबरी
-– रे ब्रेडबरी
पुस्तक प्रेमी सबसे धनवान व सुखी
होता है.
संपूर्ण रूप से त्रुटिहीन पुस्तक
कभी पढ़ने लायक नहीं होती।
- जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
- जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
यदि किसी असाधारण प्रतिभा वाले
आदमी से हमारा सामना हो तो हमें उससे पूछना चाहिये कि वो कौन सी पुस्तकें पढता है
।
— एमर्शन
— एमर्शन
किताबें ऐसी शिक्षक हैं जो बिना
कष्ट दिए, बिना आलोचना किए और बिना परीक्षा लिए हमें शिक्षा देती हैं ।
–अज्ञात
–अज्ञात
स्वाध्याय
/ अध्ययन
स्वाध्यायात मा प्रमद ।
( स्वाध्याय से प्रमाद ( आलस ) मत करो । )
( स्वाध्याय से प्रमाद ( आलस ) मत करो । )
अध्ययन हमें आनन्द तो प्रदान करता
ही है, अलंकृत भी करता है और योग्य भी बनाता है.
मस्तिष्क के लिये अध्ययन की उतनी
ही आवश्यकता है जितनी शरीर के लिये व्यायाम की ।
— जोसेफ एडिशन
— जोसेफ एडिशन
पढने से सस्ता कोई मनोरंजन नहीं ; न ही कोई खुशी , उतनी स्थायी ।
— जोसेफ एडिशन
— जोसेफ एडिशन
गुरू
आत्मनो गुरुः आत्मैव पुरुषस्य
विशेषतः |
यत प्रत्यक्षानुमानाभ्याम श्रेयसवनुबिन्दते ||
( आप ही स्वयं अपने गुरू हैं | क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा पुरुष जान लेता है कि अधिक उपयुक्त क्या है | )
यत प्रत्यक्षानुमानाभ्याम श्रेयसवनुबिन्दते ||
( आप ही स्वयं अपने गुरू हैं | क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा पुरुष जान लेता है कि अधिक उपयुक्त क्या है | )
उपयोग, दुर्उपयोग
जड़, तना, बहुतेरे
पत्ते और फल सब कुछ मेरे पास है। फिर भी मात्र छाया से रहित होने के कारण संसार
मुझ खजूर की निंदा करता रहता है।
- आर्यान्योक्तिशतक
- आर्यान्योक्तिशतक
अनेक लोग वह धन व्यय करते हैं जो
उनके द्वारा उपार्जित नहीं होता, वे चीज़ें खरीदते हैं जिनकी
उन्हें जरूरत नहीं होती, उनको प्रभावित करना चाहते हैं
जिन्हें वे पसंद नहीं करते।
- जानसन
- जानसन
मुक्त बाजार में स्वतंत्र
अभिव्यक्ति भी न्याय, मानवाधिकार, पेयजल
तथा स्वच्छ हवा की तरह ही उपभोक्ता-सामग्री बन चुकी है।यह उन्हें ही हासिल हो पाती
हैं, जो उन्हें खरीद पाते हैं। वे मुक्त अभिव्यक्ति का प्रयोग भी उस तरह
का उत्पादन बनाने में करते हैं जो सर्वथा उनके अनुकूल होता है।
- अरुंधती राय
- अरुंधती राय
संसार में दुष्ट व्यक्ति अपनी
दुष्टता को चिता में प्रवेश करने पर ही छोड़ता है।
सूक्तिमुक्तावली-७०
सूक्तिमुक्तावली-७०
भाग्य
/ किश्मत
आपका आज का पुरुषार्थ आपका कल का
भाग्य है |
-– पालशिरू
-– पालशिरू
दुनिया में कोई भी व्यक्ति
वस्तुतः भाग्यवादी नहीं है, क्योंकि मैंने एक भी ऐसा आदमी
नहीं देखा, जो अपने घर में आग लगने की बात जान कर भी निश्चित बैठा रहे।
- जे.बी. एस. हॉल्डेन
- जे.बी. एस. हॉल्डेन
कादर मन कँह एक अधारा। दैव दैव
आलसी पुकारा।।
——गोस्वामी तुलसीदास
——गोस्वामी तुलसीदास
हर इक बदनसीबी आने वाले कल की
खुशनसीबी का बीज लेकर आती है .
— ओग मेनडिनो
— ओग मेनडिनो
भाग्य के भरोसे बैठे रहने पर
भाग्य सोया रहता है पर हिम्मत बांध कर खड़े होने पर भाग्य भी उठ खड़ा होता है ।
-अज्ञात
-अज्ञात
चरित्र
व्यक्तिगत चरित्र समाज की सबसे
बडी आशा है ।
— चैनिंग
— चैनिंग
प्रत्येक मनुष्य में तीन चरित्र
होता है. एक जो वह दिखाता है, दूसरा जो उसके पास होता है, तीसरी
जो वह सोचता है कि उसके पास है |
– अलफ़ॉसो कार
– अलफ़ॉसो कार
त्रियाचरित्रं पुरुषस्य भग्यं
दैवो न जानाति कुतो नरम् ।
( स्त्री के चरित्र को और पुरुष के भाग्य को भगवान् भी नहीं जानता , मनुष्य कहाँ लगता है । )
( स्त्री के चरित्र को और पुरुष के भाग्य को भगवान् भी नहीं जानता , मनुष्य कहाँ लगता है । )
कामासक्त व्यक्ति की कोई चिकित्सा
नहीं है।
- नीतिवाक्यामृत-३।१२
- नीतिवाक्यामृत-३।१२
जिस राष्ट्र में चरित्रशीलता नहीं
है उसमें कोई योजना काम नहीं कर सकती ।
— विनोबा
— विनोबा
मनुष्य की महानता उसके कपडों से
नहीं बल्कि उसके चरित्र से आँकी जाती है ।
— स्वामी विवेकाननद
— स्वामी विवेकाननद
ईश्वर
ईश प्राप्ति (शांति) के लिए
अंतःकरण शुद्ध होना चाहिए |
– रविदास
– रविदास
ईश्वर के हाथ देने के लिए खुले
हैं. लेने के लिए तुम्हें प्रयत्न करना होगा |
– गुरु नानक देव
– गुरु नानक देव
रहिमन बहु भेषज करत , ब्याधि
न छाडत साथ ।
खग मृग बसत अरोग बन , हरि अनाथ के नाथ ॥
खग मृग बसत अरोग बन , हरि अनाथ के नाथ ॥
अजगर करैं न चाकरी, पंछी
करैं न काम।
दास मलूका कहि गये सब के दाता राम।।
—– सन्त मलूकदास
दास मलूका कहि गये सब के दाता राम।।
—– सन्त मलूकदास
मीठी
बोली / मधुर वचन / कर्कश वाणी
तुलसी मीठे बचन तें , सुख
उपजत चहुँ ओर ।
वशीकरण इक मंत्र है , परिहहुँ
बचन कठोर ॥
ऐसी बानी बोलिये , मन
का आपा खोय ।
औरन को शीतल लगे , आपहुँ शीतल होय ॥
— कबीरदास
औरन को शीतल लगे , आपहुँ शीतल होय ॥
— कबीरदास
मधुर वचन है औषधि , कटुक
वचन है तीर ।
श्रवण मार्ग ह्वै संचरै , शाले सकल शरीर ॥
— कबीरदास
श्रवण मार्ग ह्वै संचरै , शाले सकल शरीर ॥
— कबीरदास
प्रियवाक्य प्रदानेन सर्वे
तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं , वचने का दरिद्रता ॥
( प्रिय वाणी बोलने से सभी जन्तु खुश हो जाते है । इसलिये मीठी वाणी ही बोलनी चाहिये , वाणी में क्या दरिद्रता ? )
तस्मात् तदेव वक्तव्यं , वचने का दरिद्रता ॥
( प्रिय वाणी बोलने से सभी जन्तु खुश हो जाते है । इसलिये मीठी वाणी ही बोलनी चाहिये , वाणी में क्या दरिद्रता ? )
नम्रता और मीठे वचन ही मनुष्य के
सच्चे आभूषण होते हैं |
-– तिरूवल्लुवर
-– तिरूवल्लुवर
नरम शब्दों से सख्त दिलों को जीता
जा सकता है |
– सुकरात
– सुकरात
अप्रिय शब्द पशुओं को भी नहीं
सुहाते हैं |
-– बुद्ध
-– बुद्ध
खीरा सिर ते काटिये , मलियत
लौन लगाय ।
रहिमन करुवे मुखन को , चहिये यही सजाय ॥
रहिमन करुवे मुखन को , चहिये यही सजाय ॥
कडी बात भी हंसकर कही जाय तो मीथी
हो जाती है ।
— प्रेमचन्द
— प्रेमचन्द
उदारता
अयं निजः परोवेति, गणना
लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
यह् अपना है और यह पराया है ऐसी
गणना छोटे दिल वाले लोग करते हैं ।
उदार हृदय वाले लोगों का तो पृथ्वी ही परिवार है ।
उदार हृदय वाले लोगों का तो पृथ्वी ही परिवार है ।
सत्यमेव जयते । ( सत्य ही विजयी
होता है )
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु
निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चिद् दुखभागभवेत् ॥
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चिद् दुखभागभवेत् ॥
सभी सुखी हों , सभी
निरोग हों ।
सबका कल्याण हो , कोई दुख का भागी न हो ॥
सबका कल्याण हो , कोई दुख का भागी न हो ॥
यदि आप इस बात की चिंता न करें कि
आपके काम का श्रेय किसे मिलने वाला है तो आप आश्चर्यजनक कार्य कर सकते हैं
– हैरी एस. ट्रूमेन
– हैरी एस. ट्रूमेन
श्रेष्ठ आचरण का जनक परिपूर्ण
उदासीनता ही हो सकती है |
-– काउन्ट रदरफ़र्ड
-– काउन्ट रदरफ़र्ड
उदार मन वाले विभिन्न धर्मों में
सत्य देखते हैं। संकीर्ण मन वाले केवल अंतर देखते हैं ।
-चीनी कहावत
-चीनी कहावत
कबिरा आप ठगाइये , और
न ठगिये कोय ।
आप ठगे सुख होत है , और ठगे दुख होय ॥
— कबीर
आप ठगे सुख होत है , और ठगे दुख होय ॥
— कबीर
स्वास्थ्य
स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ
मस्तिष्क रहता है ।
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम । ( यह
शरीर ही सारे अच्छे कार्यों का साधन है / सारे अच्छे कार्य इस शरीर के द्वारा ही
किये जाते हैं )
आहार , स्वप्न
( नींद ) और ब्रम्हचर्य इस शरीर के तीन स्तम्भ ( पिलर ) हैं ।
— महर्षि चरक
— महर्षि चरक
मानसिक बीमारियों से बचने का एक
ही उपाय है कि हृदय को घृणा से और मन को भय व चिन्ता से मुक्त रखा जाय ।
— श्रीराम शर्मा , आचार्य
— श्रीराम शर्मा , आचार्य
जिसका यह दावा है कि वह
आध्यात्मिक चेतना के शिखर पर है मगर उसका स्वास्थ्य अक्सर खराब रहता है तो इसका
अर्थ है कि मामला कहीं गड़बड़ है।
- महात्मा गांधी
- महात्मा गांधी
स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ
मस्तिष्क रहता है ।
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम । ( यह
शरीर ही सारे अच्छे कार्यों का साधन है / सारे अच्छे कार्य इस शरीर के द्वारा ही
किये जाते हैं )
आहार , स्वप्न
( नींद ) और ब्रम्हचर्य इस शरीर के तीन स्तम्भ ( पिलर ) हैं ।
— महर्षि चरक
— महर्षि चरक
को रुक् , को
रुक् , को रुक् ?
हितभुक् , मितभुक् , ऋतभुक् ।
( कौन स्वस्थ है , कौन स्वस्थ है , कौन स्वस्थ है ?
हितकर भोजन करने वाला , कम खाने वाला , इमानदारी का अन्न खाने वाला )
हितभुक् , मितभुक् , ऋतभुक् ।
( कौन स्वस्थ है , कौन स्वस्थ है , कौन स्वस्थ है ?
हितकर भोजन करने वाला , कम खाने वाला , इमानदारी का अन्न खाने वाला )
स्वास्थ्य के संबंध में , पुस्तकों
पर भरोसा न करें। छपाई की एक गलती जानलेवा भी हो सकती है।
— मार्क ट्वेन
— मार्क ट्वेन
बीस वर्ष की आयु में व्यक्ति का
जो चेहरा रहता है, वह प्रकृति की देन है, तीस
वर्ष की आयु का चेहरा जिंदगी के उतार-चढ़ाव की देन है लेकिन पचास वर्ष की आयु का
चेहरा व्यक्ति की अपनी कमाई है।
- अष्टावक्र
- अष्टावक्र
नीम हकीम खतरे जान ।
खतरे मुल्ला दे ईमान।।
—-अज्ञात
खतरे मुल्ला दे ईमान।।
—-अज्ञात
अन्य
/ विविध / अवर्गीकृत
योगः चित्त्वृत्तिनिरोधः ।
वाक्यं रसात्मकं काव्यम ।
अलंकरोति इति अलंकारः ।
सर्वनाश समुत्पन्ने अर्धो त्यजति
पण्डितः ।
( जहाँ पूरा जा रहा हो वहाँ पण्डित आधा छोड देता है )
( जहाँ पूरा जा रहा हो वहाँ पण्डित आधा छोड देता है )
बिनु संतोष न काम नसाहीं , काम
अक्षत सुख सपनेहु नाही ।
एकै साधे सब सधे , सब
साधे सब जाय ।
रहिमन मूलहिं सीचिबो, फूलै
फलै अघाय ॥
उदाहरण वह पाठ है जिसे हर कोई पढ
सकता है ।
भोगाः न भुक्ता वयमेव भुक्ता: , तृष्णा
न जीर्णा वयमेव जीर्णा: ।
( भोग नहीं भोगे गये, हम ही भोगे गये । इच्छा बुढी नहीं हुई , हम ही बूढे हो गये । )
— भर्तृहरि
( भोग नहीं भोगे गये, हम ही भोगे गये । इच्छा बुढी नहीं हुई , हम ही बूढे हो गये । )
— भर्तृहरि
चेहरों में सबसे भद्दा चेहरा
मनुष्य काही है ।
— लैब्रेटर
— लैब्रेटर
हँसमुख चेहरा रोगी के लिये उतना
ही लाभकर है जितना कि स्वस्थ ऋतु ।
— बेन्जामिन
— बेन्जामिन
हम उन लोगों को प्रभावित करने के
लिये महंगे ढंग से रहते हैं जो हम पर प्रभाव जमाने के लिये महंगे ढंग से रहते है ।
— अनोन
— अनोन
कीरति भनिति भूति भलि सोई , सुरसरि
सम सबकँह हित होई ॥
— तुलसीदास
— तुलसीदास
स्पष्टीकरण से बचें । मित्रों को
इसकी आवश्यकता नहीं ; शत्रु इस पर विश्वास नहीं करेंगे
।
— अलबर्ट हबर्ड
— अलबर्ट हबर्ड
अपने उसूलों के लिये , मैं
स्वंय मरने तक को भी तैयार हूँ , लेकिन किसी को मारने के लिये , बिल्कुल
नहीं।
— महात्मा गाँधी
— महात्मा गाँधी
विजयी व्यक्ति स्वभाव से , बहिर्मुखी
होता है। पराजय व्यक्ति को अन्तर्मुखी बनाती है।
— प्रेमचंद
— प्रेमचंद
अतीत चाहे जैसा हो , उसकी
स्मृतियाँ प्रायः सुखद होती हैं ।
— प्रेमचंद
— प्रेमचंद
मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।
— महात्मा गाँधी
— महात्मा गाँधी
परमार्थ : उच्चस्तरीय स्वार्थ का नाम ही परमार्थ है । परमार्थ के लिये त्याग
आवश्यक है पर यह एक बहुत बडा निवेश है जो घाटा उठाने की स्थिति में नहीं आने देता
।
बुराई के अवसर दिन में सौ बार आते
हैं तो भलाई के साल में एकाध बार.
एक शेर को भी मक्खियों से अपनी
रक्षा करनी पड़ती है.
अपनी आंखों को सितारों पर टिकाने
से पहले अपने पैर जमीन में गड़ा लो |
-– थियोडॉर रूज़वेल्ट
-– थियोडॉर रूज़वेल्ट
आमतौर पर आदमी उन चीजों के बारे
में जानने के लिए उत्सुक रहता है जिनका उससे कोई लेना देना नहीं होता |
-– जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
-– जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
ईश्वर एक ही समय में सर्वत्र
उपस्थित नहीं हो सकता था , अतः उसने ‘मां’ बनाया.
काली मुरग़ी भी सफ़ेद अंडा देती
है.
वहाँ मत देखो जहाँ आप गिरे. वहाँ
देखो जहाँ से आप फिसले.
हाथी कभी भी अपने दाँत को ढोते
हुए नहीं थकता.
तालाब शांत है इसका अर्थ यह नहीं
कि इसमें मगरमच्छ नहीं हैं
-– माले
-– माले
सूर्य की तरफ मुँह करो और
तुम्हारी छाया तुम्हारे पीछे होगी |
-– माओरी
-– माओरी
खेल के अंत में राजा और पिद्दा एक
ही बक्से में रखे जाते हैं |
-– इतालवी सूक्ति
-– इतालवी सूक्ति
यदि आप गर्मी सहन नहीं कर सकते तो
रसोई के बाहर निकल जाईये ।
-– हैरी एस ट्रुमेन
-– हैरी एस ट्रुमेन
जब मैं किसी नारी के सामने खड़ा
होता हूँ तो ऐसा प्रतीत होता है कि ईश्वर के सामने खड़ा हूँ.
— एलेक्जेंडर स्मिथ
— एलेक्जेंडर स्मिथ
अगर आपके पास जेब में सिर्फ दो
पैसे हों तो एक पैसे से रोटी खरीदें तथा दूसरे से गुलाब की एक कली.
कभी भी सफाई नहीं दें. आपके
दोस्तों को इसकी आवश्यकता नहीं है और आपके दुश्मनों को विश्वास ही नहीं होगा |
-– अलबर्ट हब्बार्ड
-– अलबर्ट हब्बार्ड
कविता में कोई पैसा नहीं है.
परंतु पैसा में भी तो कविता नहीं है.
-– रॉबर्ट ग्रेव्स
-– रॉबर्ट ग्रेव्स
बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू
यह होता है कि ध्यानपूर्वक यह सुना जाए कि कहा क्या जा रहा है.
तुम अगर सूर्य के जीवन से चले
जाने पर चिल्लाओगे तो आँसू भरी आँखे सितारे कैसे देखेंगी ?
— रविंद्रनाथ टैगोर
— रविंद्रनाथ टैगोर
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि
गरीयसी
—–महर्षि वाल्मीकि (रामायण)
( जननी ( माता ) और जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक श्रेष्ठ है)
—–महर्षि वाल्मीकि (रामायण)
( जननी ( माता ) और जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक श्रेष्ठ है)
जो दूसरों से घृणा करता है वह
स्वयं पतित होता है – विवेकानन्द
जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर
है.
कबिरा घास न निन्दिये जो पाँवन तर
होय।
उड़ि कै परै जो आँख में खरो दुहेलो होय।।
—-सन्त कबीर
उड़ि कै परै जो आँख में खरो दुहेलो होय।।
—-सन्त कबीर
ऊँच अटारी मधुर वतास। कहैं घाघ घर
ही कैलाश।
—-घाघ भड्डरी (अकबर के समकालीन, कानपुर जिले के निवासी)
—-घाघ भड्डरी (अकबर के समकालीन, कानपुर जिले के निवासी)
तुलसी इस संसार मेम , सबसे
मिलिये धाय ।
ना जाने किस रूप में नारायण मिल जाँय ॥
ना जाने किस रूप में नारायण मिल जाँय ॥
अति सर्वत्र वर्जयेत् ।
( अति करने से सर्वत्र बचना चाहिये । )
( अति करने से सर्वत्र बचना चाहिये । )
कोई भी देश अपनी अच्छाईयों को खो
देने पर पतीत होता है। -गुरू नानक
प्यार के अभाव में ही लोग भटकते
हैं और भटके हुए लोग प्यार से ही सीधे रास्ते पर लाए जा सकते हैं। ईसा मसीह
जो हमारा हितैषी हो, दुख-सुख
में बराबर साथ निभाए, गलत राह पर जाने से रोके और अच्छे
गुणों की तारीफ करे, केवल वही व्यक्ति मित्र कहलाने के
काबिल है। -वेद
ज्ञानीजन विद्या विनय युक्त
ब्राम्हण तथा गौ हाथी कुत्ते और चाण्डाल मे भी समदर्शी होते हैं ।
यदि सज्जनो के मार्ग पर पुरा नही
चला जा सकता तो थोडा ही चले । सन्मार्ग पर चलने वाला पुरूष नष्ट नही होता।
कोई भी वस्तु निरर्थक या तुच्छ
नहीम है । प्रत्येक वस्तु अपनी स्थिति मे सर्वोत्कृष्ट है ।
— लांगफेलो
— लांगफेलो
दुनिया में ही मिलते हैं हमे
दोजखो-जन्नत ।
इंसान जरा सैर करे , घर से निकल कर ॥
— दाग
इंसान जरा सैर करे , घर से निकल कर ॥
— दाग
विश्व एक महान पुस्तक है जिसमें
वे लोग केवल एक ही पृष्ठ पढ पाते हैं जो कभी घर से बाहर नहीं निकलते ।
— आगस्टाइन
— आगस्टाइन
दुख और वेदना के अथाह सागर वाले
इस संसार में प्रेम की अत्यधिक आवश्यकता है। -डा रामकुमार वर्मा
डूबते को तारना ही अच्छे इंसान का
कर्तव्य होता है। -अज्ञात
जिसने अकेले रह कर अकेलेपन को
जीता उसने सबकुछ जीता। -अज्ञात
अच्छी योजना बनाना बुद्धिमानी का
काम है पर उसको ठीक से पूरा करना धैर्य और परिश्रम का ।
— कहावत
— कहावत
ऐसे देश को छोड़ देना चाहिये जहां
न आदर है, न जीविका, न मित्र, न
परिवार और न ही ज्ञान की आशा ।
–विनोबा
–विनोबा
विश्वास वह पक्षी है जो प्रभात के
पूर्व अंधकार में ही प्रकाश का अनुभव करता है और गाने लगता है ।
–रवींद्रनाथ ठाकुर
–रवींद्रनाथ ठाकुर
आपका कोई भी काम महत्वहीन हो सकता
है पर महत्वपूर्ण यह है कि आप कुछ करें। -महात्मा गांधी
पाषाण के भीतर भी मधुर स्रोत होते
हैं, उसमें मदिरा नहीं शीतल जल की धारा बहती है। - जयशंकर प्रसाद
उड़ने की अपेक्षा जब हम झुकते हैं
तब विवेक के अधिक निकट होते हैं।
–अज्ञात
–अज्ञात
विश्वास हृदय की वह कलम है जो
स्वर्गीय वस्तुओं को चित्रित करती है । - अज्ञात
गरीबों के समान विनम्र अमीर और
अमीरों के समान उदार गऱीब ईश्वर के प्रिय पात्र होते हैं। - सादी
जिस प्रकार मैले दर्पण में सूरज
का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता उसी प्रकार मलिन अंत:करण में ईश्वर के प्रकाश का
पतिबिम्ब नहीं पड़ सकता । - रामकृष्ण परमहंस
मिलने पर मित्र का आदर करो, पीठ
पीछे प्रशंसा करो और आवश्यकता के समय उसकी मदद करो। - अज्ञात
जैसे छोटा सा तिनका हवा का स्र्ख़
बताता है वैसे ही मामूली घटनाएं मनुष्य के हृदय की वृत्ति को बताती हैं। - महात्मा
गांधी
देश-प्रेम के दो शब्दों के
सामंजस्य में वशीकरण मंत्र है, जादू का सम्मिश्रण है। यह वह
कसौटी है जिसपर देश भक्तों की परख होती है। -बलभद्र प्रसाद गुप्त ‘रसिक’
दरिद्र व्यक्ति कुछ वस्तुएं चाहता
है, विलासी बहुत सी और लालची सभी वस्तुएं चाहता है। -अज्ञात
चंद्रमा अपना प्रकाश संपूर्ण आकाश
में फैलाता है परंतु अपना कलंक अपने ही पास रखता है। -रवीन्द्र
जल में मीन का मौन है, पृथ्वी
पर पशुओं का कोलाहल और आकाश में पंछियों का संगीत पर मनुष्य में जल का मौन पृथ्वी
का कोलाहल और आकाश का संगीत सबकुछ है। -रवीन्द्रनाथ ठाकुर
चरित्रहीन शिक्षा, मानवता
विहीन विज्ञान और नैतिकता विहीन व्यापार ख़तरनाक होते हैं। -सत्यसांई बाबा
अनुराग, यौवन, रूप
या धन से उत्पन्न नहीं होता। अनुराग, अनुराग से उत्पन्न होता है। -
प्रेमचंद
खातिरदारी जैसी चीज़ में मिठास
जरूर है, पर उसका ढकोसला करने में न तो मिठास है और न स्वाद। -शरतचन्द्र
लगन और योग्यता एक साथ मिलें तो
निश्चय ही एक अद्वितीय रचना का जन्म होता है । -मुक्ता
अनुभव, ज्ञान
उन्मेष और वयस् मनुष्य के विचारों को बदलते हैं। -हरिऔध
मनुष्य का जीवन एक महानदी की
भांति है जो अपने बहाव द्वारा नवीन दिशाओं में राह बना लेती है। - रवीन्द्रनाथ
ठाकुर
प्रत्येक बालक यह संदेश लेकर आता
है कि ईश्वर अभी मनुष्यों से निराश नहीं हुआ है। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर
मनुष्य क्रोध को प्रेम से, पाप
को सदाचार से लोभ को दान से और झूठ को सत्य से जीत सकता है । -गौतम बुद्ध
स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध
अधिकार है! -लोकमान्य तिलक
त्योहार साल की गति के पड़ाव हैं, जहां
भिन्न-भिन्न मनोरंजन हैं, भिन्न-भिन्न आनंद हैं, भिन्न-भिन्न
क्रीडास्थल हैं। -बस्र्आ
दुखियारों को हमदर्दी के आंसू भी
कम प्यारे नहीं होते। -प्रेमचंद
अधिक हर्ष और अधिक उन्नति के बाद
ही अधिक दुख और पतन की बारी आती है। -जयशंकर प्रसाद
अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के
चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से
उन्हें सींच-सींच कर महाप्राण शक्तियां बनाते हैं -महर्षि अरविन्द
द्वेष बुद्धि को हम द्वेष से नहीं
मिटा सकते, प्रेम की शक्ति ही उसे मिटा सकती है। - विनोबा
सहिष्णुता और समझदारी संसदीय
लोकतंत्र के लिये उतने ही आवश्यक है जितने संतुलन और मर्यादित चेतना । - डा शंकर
दयाल शर्मा
सारा जगत स्वतंत्रताके लिये
लालायित रहता है फिर भी प्रत्येक जीव अपने बंधनो को प्यार करता है। यही हमारी
प्रकृति की पहली दुरूह ग्रंथि और विरोधाभास है। - श्री अरविंद
सत्याग्रह की लड़ाई हमेशा दो
प्रकार की होती है । एक जुल्मों के खिलाफ और दूसरी स्वयं की दुर्बलता के विरूद्ध ।
- सरदार पटेल
तप ही परम कल्याण का साधन है।
दूसरे सारे सुख तो अज्ञान मात्र हैं। - वाल्मीकि
भूलना प्रायः प्राकृतिक है जबकि
याद रखना प्रायः कृत्रिम है।
- रत्वान रोमेन खिमेनेस
- रत्वान रोमेन खिमेनेस
जो व्यक्ति अनेक लोगों पर दोष
लगाता है , वह स्वयं को दोषी सिद्ध करता है ।
तूफान जितना ही बडा होगा , उतना
ही जल्दी खत्म भी हो जायेगा ।
लडखडाने के फलस्वरूप आप गिरने से
बच जाते हैं ।
रत्नं रत्नेन संगच्छते ।
( रत्न , रत्न के साथ जाता है )
( रत्न , रत्न के साथ जाता है )
गुणः खलु अनुरागस्य कारणं , न
बलात्कारः ।
( केवल गुण ही प्रेम होने का कारण है , बल प्रयोग नहीं )
( केवल गुण ही प्रेम होने का कारण है , बल प्रयोग नहीं )
निर्धनता प्रकारमपरं षष्टं
महापातकम् ।
( गरीबी दूसरे प्रकार से छठा महापातक है । )
( गरीबी दूसरे प्रकार से छठा महापातक है । )
अपेयेषु तडागेषु बहुतरं उदकं भवति
।
( जिस तालाब का पानी पीने योग्य नहीं होता , उसमें बहुत जल भरा होता है । )
( जिस तालाब का पानी पीने योग्य नहीं होता , उसमें बहुत जल भरा होता है । )
अङ्गुलिप्रवेशात् बाहुप्रवेश: |
( अंगुली प्रवेश होने के बाद हाथ प्रवेश किया जता है । )
( अंगुली प्रवेश होने के बाद हाथ प्रवेश किया जता है । )
अति तृष्णा विनाशाय.
( अधिक लालच नाश कराती है । )
( अधिक लालच नाश कराती है । )
अति सर्वत्र वर्जयेत् ।
( अति ( को करने ) से सब जगह बचना चाहिये । )
( अति ( को करने ) से सब जगह बचना चाहिये । )
अजा सिंहप्रसादेन वने चरति
निर्भयम्.
( शेर की कृपा से बकरी जंगल मे बिना भय के चरती है । )
( शेर की कृपा से बकरी जंगल मे बिना भय के चरती है । )
अतिभक्ति चोरलक्षणम्.
( अति-भक्ति चोर का लक्षण है । )
( अति-भक्ति चोर का लक्षण है । )
अल्पविद्या भयङ्करी.
( अल्पविद्या भयंकर होती है । )
( अल्पविद्या भयंकर होती है । )
कुपुत्रेण कुलं नष्टम्.
( कुपुत्र से कुल नष्ट हो जाता है । )
( कुपुत्र से कुल नष्ट हो जाता है । )
ज्ञानेन हीना: पशुभि: समाना:.
( ज्ञानहीन पशु के समान हैं । )
( ज्ञानहीन पशु के समान हैं । )
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे गर्दभी
ह्यप्सरा भवेत्.
( सोलह वर्ष की होने पर गदही भी अप्सरा बन जाती है । )
( सोलह वर्ष की होने पर गदही भी अप्सरा बन जाती है । )
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं
मित्रवदाचरेत्.
( सोलह वर्ष की अवस्था को प्राप्त पुत्र से मित्र की भाँति आचरं करना चाहिये । )
( सोलह वर्ष की अवस्था को प्राप्त पुत्र से मित्र की भाँति आचरं करना चाहिये । )
मधुरेण समापयेत्.
( मिठास के साथ ( मीठे वचन या मीठा स्वाद ) समाप्त करना चाहिये । )
( मिठास के साथ ( मीठे वचन या मीठा स्वाद ) समाप्त करना चाहिये । )
मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना.
( हर व्यक्ति अलग तरह से सोचता है । )
( हर व्यक्ति अलग तरह से सोचता है । )
शठे शाठ्यं समाचरेत् ।
( दुष्ट के साथ दुष्टता का वर्ताव करना चाहिये । )
( दुष्ट के साथ दुष्टता का वर्ताव करना चाहिये । )
सत्यं शिवं सुन्दरम्.
( सत्य , कल्याणकारी और सुन्दर । ( किसी रचना/कृति या विचार को परखने की कसौटी ) )
( सत्य , कल्याणकारी और सुन्दर । ( किसी रचना/कृति या विचार को परखने की कसौटी ) )
सा विद्या या विमुक्तये.
( विद्या वह है जो बन्धन-मुक्त करती है । )
( विद्या वह है जो बन्धन-मुक्त करती है । )
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