Saturday, 26 July 2014

बोल वचन- 2

लोकतन्त्र / प्रजातन्त्र / जनतन्त्र
लोकतन्त्र , जनता की , जनता द्वारा , जनता के लिये सरकार होती है ।
 अब्राहम लिंकन
लोकतंत्र इस धारणा पर आधारित है कि साधारण लोगों में असाधारण संभावनाएँ होती है ।
 हेनरी एमर्शन फास्डिक
शान्तिपूर्वक सरकार बदल देने की शक्ति प्रजातंत्र की आवश्यक शर्त है । प्रजातन्त्र और तानाशाही मे अन्तर नेताओं के अभाव में नहीं है , बल्कि नेताओं को बिना उनकी हत्या किये बदल देने में है ।
 लार्ड बिवरेज
अगर हम लोकतन्त्र की सच्ची भावना का विकास करना चाहते हैं तो हम असहिष्णु नहीं हो सकते। असहिष्णुता से पता चलता है कि हमें अपने उद्देश्य की पवित्रता में पूरा विश्वास नहीं है।
बहुमत का शासन जब ज़ोर-जबरदस्ती का शासन हो जाए तो वह उतना ही असहनीय हो जाता है जितना कि नौकरशाही का शासन।
- महात्मा गांधी
जैसी जनता , वैसा राजा ।
प्रजातन्त्र का यही तकाजा ॥
 श्रीराम शर्मा , आचार्य
अगर हम लोकतन्त्र की सच्ची भावना का विकास करना चाहते हैं तो हम असहिष्णु नहीं हो सकते। असहिष्णुता से पता चलता है कि हमें अपने उद्देश्य की पवित्रता में पूरा विश्वास नहीं है।
बहुमत का शासन जब ज़ोर-जबरदस्ती का शासन हो जाए तो वह उतना ही असहनीय हो जाता है जितना कि नौकरशाही का शासन।
 महात्मा गांधी
सर्वसाधारण जनता की उपेक्षा एक बड़ा राष्ट्रीय अपराध है ।
स्वामी विवेकानंद
लोकतंत्र के पौधे का, चाहे वह किसी भी किस्म का क्यों न हो तानाशाही में पनपना संदेहास्पद है ।
 जयप्रकाश नारायण


नियम / कानून / विधान / न्याय
न हि कश्चिद् आचारः सर्वहितः संप्रवर्तते ।
( कोई भी नियम नहीं हो सकता जो सभी के लिए हितकर हो )
 महाभारत
अपवाद के बिना कोई भी नियम लाभकर नहीं होता ।
 थामस फुलर
थोडा-बहुत अन्याय किये बिना कोई भी महान कार्य नहीं किया जा सकता ।
 लुइस दी उलोआ
संविधान इतनी विचित्र ( आश्चर्यजनक ) चीज है कि जो यह् नहीं जानता कि ये ये क्या चीज होती है , वह गदहा है ।
लोकतंत्र - जहाँ धनवान, नियम पर शाशन करते हैं और नियम, निर्धनों पर ।
सभी वास्तविक राज्य भ्रष्ट होते हैं । अच्छे लोगों को चाहिये कि नियमों का पालन बहुत काडाई से न करें ।
 इमर्शन
न राज्यं न च राजासीत् , न दण्डो न च दाण्डिकः ।
स्वयमेव प्रजाः सर्वा , रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥
( न राज्य था और ना राजा था , न दण्ड था और न दण्ड देने वाला ।
स्वयं सारी प्रजा ही एक-दूसरे की रक्षा करती थी । )
कानून चाहे कितना ही आदरणीय क्यों न हो , वह गोलाई को चौकोर नहीं कह सकता।
 फिदेल कास्त्रो


व्यवस्था
व्यवस्था मस्तिष्क की पवित्रता है , शरीर का स्वास्थ्य है , शहर की शान्ति है , देश की सुरक्षा है । जो सम्बन्ध धरन ( बीम ) का घर से है , या हड्डी का शरीर से है , वही सम्बन्ध व्यवस्था का सब चीजों से है ।
 राबर्ट साउथ
अच्छी व्यवस्था ही सभी महान कार्यों की आधारशिला है ।
एडमन्ड बुर्क
सभ्यता सुव्यस्था के जन्मती है , स्वतन्त्रता के साथ बडी होती है और अव्यवस्था के साथ मर जाती है ।
 विल डुरान्ट
हर चीज के लिये जगह , हर चीज जगह पर ।
 बेन्जामिन फ्रैंकलिन
सुव्यवस्था स्वर्ग का पहला नियम है ।
 अलेक्जेन्डर पोप
परिवर्तन के बीच व्यवस्था और व्यवस्था के बीच परिवर्तन को बनाये रखना ही प्रगति की कला है ।
 अल्फ्रेड ह्वाइटहेड


विज्ञापन
मैं ने कोई विज्ञापन ऐसा नहीं देखा जिसमें पुरुष स्त्री से कह रहा हो कि यह साड़ी या स्नो खरीद ले। अपनी चीज़ वह खुद पसंद करती है मगर पुरुष की सिगरेट से लेकर टायर तक में वह दखल देती है।
- हरिशंकर परसाई


समय
आयुषः क्षणमेकमपि, न लभ्यः स्वर्णकोटिभिः ।
स वृथा नीयती येन, तस्मै नृपशवे नमः ॥
करोडों स्वर्ण मुद्राओं के द्वारा आयु का एक क्षण भी नहीं पाया जा सकता ।
वह ( क्षण ) जिसके द्वारा व्यर्थ नष्ट किया जाता है , ऐसे नर-पशु को नमस्कार ।
समय को व्यर्थ नष्ट मत करो क्योंकि यही वह चीज है जिससे जीवन का निर्माण हुआ है ।
 बेन्जामिन फ्रैंकलिन
समय और समुद्र की लहरें किसी का इंतजार नहीं करतीं |
 अज्ञात्
जैसे नदी बह जाती है और लौट कर नहीं आती, उसी तरह रात-दिन मनुष्य की आयु लेकर चले जाते हैं, फिर नहीं आते।
- महाभारत
किसी भी काम के लिये आपको कभी भी समय नहीं मिलेगा । यदि आप समय पाना चाहते हैं तो आपको इसे बनाना पडेगा ।
क्षणशः कणशश्चैव विद्याधनं अर्जयेत ।
( क्षण-क्षण का उपयोग करके विद्या का और कण-कण का उपयोग करके धन का अर्जन करना चाहिये )
काल्ह करै सो आज कर, आज करि सो अब ।
पल में परलय होयगा, बहुरि करेगा कब ॥
 कबीरदास
समय-लाभ सम लाभ नहिं , समय-चूक सम चूक ।
चतुरन चित रहिमन लगी , समय-चूक की हूक ॥
अपने काम पर मै सदा समय से १५ मिनट पहले पहुँचा हूँ और मेरी इसी आदत ने मुझे कामयाब व्यक्ति बना दिया है ।
हमें यह विचार त्याग देना चाहिये कि हमें नियमित रहना चाहिये । यह विचार आपके असाधारण बनने के अवसर को लूट लेता है और आपको मध्यम बनने की ओर ले जाता है ।
दीर्घसूत्री विनश्यति । ( काम को बहुत समय तक खीचने वाले का नाश हो जाता है )
समयनिष्ठ होने पर समस्या यह हो जाती है कि इसका आनंद अकसर आपको अकेले लेना पड़ता है.
- एनॉन
ऐसी घडी नहीं बन सकती जो गुजरे हुए घण्टे को फिर से बजा दे ।
 प्रेमचन्द


अवसर / मौका / सुतार / सुयोग
जो प्रमादी है , वह सुयोग गँवा देगा ।
 श्रीराम शर्मा , आचार्य
बाजार में आपाधापी - मतलब , अवसर ।
धरती पर कोई निश्चितता नहीं है , बस अवसर हैं ।
 डगलस मैकआर्थर
संकट के समय ही नायक बनाये जाते हैं ।
आशावादी को हर खतरे में अवसर दीखता है और निराशावादी को हर अवसर मे खतरा ।
 विन्स्टन चर्चिल
अवसर के रहने की जगह कठिनाइयों के बीच है ।
 अलबर्ट आइन्स्टाइन
हमारा सामना हरदम बडे-बडे अवसरों से होता रहता है , जो चालाकी पूर्वक असाध्य समस्याओं के वेष में (छिपे) रहते हैं ।
 ली लोकोक्का
रहिमन चुप ह्वै बैठिये , देखि दिनन को फेर ।
जब नीके दिन आइहैं , बनत न लगिहैं देर ॥
न इतराइये , देर लगती है क्या |
जमाने को करवट बदलते हुए ||
कभी कोयल की कूक भी नहीं भाती और कभी (वर्षा ऋतु में) मेंढक की टर्र टर्र भी भली प्रतीत होती है |
- गोस्वामी तुलसीदास
वसंत ऋतु निश्चय ही रमणीय है। ग्रीष्म ऋतु भी रमणीय है। वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर भी रमणीय है, अर्थात सब समय उत्तम है।
- सामवेद
का बरखा जब कृखी सुखाने। समय चूकि पुनि का पछिताने।।
—–गोस्वामी तुलसीदास
अवसर कौडी जो चुके , बहुरि दिये का लाख ।
दुइज न चन्दा देखिये , उदौ कहा भरि पाख ॥
—–गोस्वामी तुलसीदास

इतिहास
उचित रूप से ( देंखे तो ) कुछ भी इतिहास नही है ; (सब कुछ) मात्र आत्मकथा है ।
 इमर्सन
इतिहास सदा विजेता द्वारा ही लिखा जता है ।
इतिहास, शक्तिशाली लोगों द्वारा, उनके धन और बल की रक्षा के लिये लिखा जाता है ।
इतिहास , असत्यों पर एकत्र की गयी सहमति है।
 नेपोलियन बोनापार्ट
जो इतिहास को याद नहीं रखते , उनको इतिहास को दुहराने का दण्ड मिलता है ।
 जार्ज सन्तायन
ज्ञानी लोगों का कहना है कि जो भी भविष्य को देखने की इच्छा हो भूत (इतिहास) से सीख ले ।
 मकियावेली , ” द प्रिन्स  में
इतिहास स्वयं को दोहराता है , इतिहास के बारे में यही एक बुरी बात है ।
सी डैरो
संक्षेप में , मानव इतिहास सुविचारों का इतिहास है ।
 एच जी वेल्स
सभ्यता की कहानी , सार रूप में , इंजिनीयरिंग की कहानी है - वह लम्बा और विकट संघर्ष जो प्रकृति की शक्तियो को मनुष्य के भले के लिये काम कराने के लिये किया गया ।
 एस डीकैम्प
इंजिनीयर इतिहास का निर्माता रहा है, और आज भी है ।
 जेम्स के. फिंक
इतिहास से हम सीखते हैं कि हमने उससे कुछ नही सीखा।

शक्ति / प्रभुता / सामर्थ्य / बल / वीरता
वीरभोग्या वसुन्धरा ।
( पृथ्वी वीरों द्वारा भोगी जाती है )
कोऽतिभारः समर्थानामं , किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सविद्यानां , कः परः प्रियवादिनाम् ॥
 पंचतंत्र
जो समर्थ हैं उनके लिये अति भार क्या है ? व्यवस्सयियों के लिये दूर क्या है?
विद्वानों के लिये विदेश क्या है? प्रिय बोलने वालों के लिये कौन पराया है ?
खुदी को कर बुलन्द इतना, कि हर तकदीर के पहले ।
खुदा बंदे से खुद पूछे , बता तेरी रजा क्या है ?
 अकबर इलाहाबादी
कौन कहता है कि आसमा मे छेद हो सकता नही |
कोई पत्थर तो तबियत से उछालो यारों ।|
यो विषादं प्रसहते, विक्रमे समुपस्थिते ।
तेजसा तस्य हीनस्य, पुरूषार्थो न सिध्यति ॥
( पराक्रम दिखाने का अवसर आने पर जो दुख सह लेता है (लेकिन पराक्रम नही दिखाता) उस तेज से हीन का पुरुषार्थ सिद्ध नही होता )
नाभिषेको न च संस्कारः, सिंहस्य कृयते मृगैः ।
विक्रमार्जित सत्वस्य, स्वयमेव मृगेन्द्रता ॥
(जंगल के जानवर सिंह का न अभिषेक करते हैं और न संस्कार । पराक्रम द्वारा अर्जित सत्व को स्वयं ही जानवरों के राजा का पद मिल जाता है )
जो मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार बोझ लेकर चलता है वह किसी भी स्थान पर गिरता नहीं है और न दुर्गम रास्तों में विनष्ट ही होता है।
- मृच्छकटिक
अधिकांश लोग अपनी दुर्बलताओं को नहीं जानते, यह सच है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अधिकतर लोग अपनी शक्ति को भी नहीं जानते।
 जोनाथन स्विफ्ट
मनुष्य अपनी दुर्बलता से भली-भांति परिचित रहता है , पर उसे अपने बल से भी अवगत होना चाहिये ।
 जयशंकर प्रसाद
आत्म-वृक्ष के फूल और फल शक्ति को ही समझना चाहिए।
- श्रीमद्भागवत ८।१९।३९
तलवार ही सब कुछ है, उसके बिना न मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है और न निर्बल की ।
गुरू गोविन्द सिंह


युद्ध / शान्ति
सर्वविनाश ही , सह-अस्तित्व का एकमात्र विकल्प है।
 पं. जवाहरलाल नेहरू
सूच्याग्रं नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव ।
( हे कृष्ण , बिना युद्ध के सूई के नोक के बराबर भी ( जमीन ) नहीं दूँगा ।
 दुर्योधन , महाभारत में
प्रागेव विग्रहो न विधिः ।
पहले ही ( बिना साम, दान , दण्ड का सहारा लिये ही ) युद्ध करना कोई (अच्छा) तरीका नहीं है ।
 पंचतन्त्र
यदि शांति पाना चाहते हो , तो लोकप्रियता से बचो।
 अब्राहम लिंकन
शांति , प्रगति के लिये आवश्यक है।
 डा॰राजेन्द्र प्रसाद
बारह फकीर एक फटे कंबल में आराम से रात काट सकते हैं मगर सारी धरती पर यदि केवल दो ही बादशाह रहें तो भी वे एक क्षण भी आराम से नहीं रह सकते।
- शम्स-ए-तबरेज़
शाश्वत शान्ति की प्राप्ति के लिए शान्ति की इच्छा नहीं बल्कि आवश्यक है इच्छाओं की शान्ति ।
स्वामी ज्ञानानन्द


आत्मविश्वास / निर्भीकता
आत्मविश्वास , वीरता का सार है ।
 एमर्सन
आत्मविश्वास , सफलता का मुख्य रहस्य है ।
 एमर्शन
आत्मविश्वा बढाने की यह रीति है कि वह का करो जिसको करते हुए डरते हो ।
 डेल कार्नेगी
हास्यवृति , आत्मविश्वास (आने) से आती है ।
 रीता माई ब्राउन
मुस्कराओ , क्योकि हर किसी में आत्म्विश्वास की कमी होती है , और किसी दूसरी चीज की अपेक्षा मुस्कान उनको ज्यादा आश्वस्त करती है ।
एन्ड्री मौरोइस
करने का कौशल आपके करने से ही आता है ।


प्रश्न / शंका / जिज्ञासा / आश्चर्य
वैज्ञानिक मस्तिष्क उतना अधिक उपयुक्त उत्तर नही देता जितना अधिक उपयुक्त वह प्रश्न पूछता है ।
भाषा की खोज प्रश्न पूछने के लिये की गयी थी । उत्तर तो संकेत और हाव-भाव से भी दिये जा सकते हैं , पर प्रश्न करने के लिये बोलना जरूरी है । जब आदमी ने सबसे पहले प्रश्न पूछा तो मानवता परिपक्व हो गयी । प्रश्न पूछने के आवेग के अभाव से सामाजिक स्थिरता जन्म लेती है ।
 एरिक हाफर
प्रश्न और प्रश्न पूछने की कला, शायद सबसे शक्तिशाली तकनीक है ।
सही प्रश्न पूछना मेधावी बनने का मार्ग है ।
मूर्खतापूर्ण-प्रश्न , कोई भी नहीं होते औरे कोई भी तभी मूर्ख बनता है जब वह प्रश्न पूछना बन्द कर दे ।
 स्टीनमेज
जो प्रश्न पूछता है वह पाँच मिनट के लिये मूर्ख बनता है लेकिन जो नही पूछता वह जीवन भर मूर्ख बना रहता है ।
सबसे चालाक व्यक्ति जितना उत्तर दे सकता है , सबसे बडा मूर्ख उससे अधिक पूछ सकता है ।
मैं छः ईमानदार सेवक अपने पास रखता हूँ | इन्होंने मुझे वह हर चीज़ सिखाया है जो मैं जानता हूँ | इनके नाम हैं  क्या, क्यों, कब, कैसे, कहाँ और कौन |
- रुडयार्ड किपलिंग
यह कैसा समय है? मेरे कौन मित्र हैं? यह कैसा स्थान है। इससे क्या लाभ है और क्या हानि? मैं कैसा हूं। ये बातें बार-बार सोचें (जब कोई काम हाथ में लें)।
- नीतसार
शंका नहीं बल्कि आश्चर्य ही सारे ज्ञान का मूल है ।
 अब्राहम हैकेल


सूचना / सूचना की शक्ति / सूचना-प्रबन्धन / सूचना प्रौद्योगिकी / सूचना-साक्षरता / सूचना प्रवीण / सूचना की सतंत्रता / सूचना-अर्थव्यवस्था
संचार , गणना ( कम्प्यूटिंग ) और सूचना अब नि:शुल्क वस्तुएँ बन गयी हैं ।
ज्ञान, कमी के मूल आर्थिक सिद्धान्त को अस्वीकार करता है । जितना अधिक आप इसका उपभोग करते हैं और दूसरों को बाटते हैं , उतना ही अधिक यह बढता है । इसको आसानी से बहुगुणित किया जा सकता है और बार-बार उपभोग ।
एक ऐसे विद्यालय की कल्पना कीजिए जिसके छात्र तो पढ-लिख सकते हों लेकिन शिक्षक नहीं ; और यह उपमा होगी उस सूचना-युग की, जिसमें हम जी रहे हैं ।
गुप्तचर ही राजा के आँख होते हैं ।
 हितोपदेश
पर्दे और पाप का घनिष्ट सम्बन्ध होता है ।
सूचना ही लोकतन्त्र की मुद्रा है ।
 थामस जेफर्सन
ज्ञान का विकास और प्रसार ही स्वतन्त्रता की सच्चा रक्षक है ।
 जेम्स मेडिसन
ज्ञान हमेशा ही अज्ञान पर शाशन करेगा ; और जो लोग स्व-शाशन के इच्छुक हैं उन्हें स्वयं को उन शक्तियों से सुसज्जित करना चाहिये जो ज्ञान से प्राप्त होती हैं ।
 पैट्रिक हेनरी


लिखना / नोट करना / सूची ( लिस्ट ) बनाना
कागज स्थान की बचत करता है , समय की बचत करता है और श्रम की बचत करता है ।
 ममफोर्ड
पठन किसी को सम्पूर्ण आदमी बनाता है , वार्तालाप उसे एक तैयार आदमी बनाता है , लेकिन लेखन उसे एक अति शुद्ध आदमी बनाता है ।
 बेकन
जब कुछ सन्देह हो , लिख लो ।
मैं यह जानने के लिये लिखता हूँ कि मैं सोचता क्या हूँ ।
 ग्राफिटो
कलम और कागज की सहायता से आप अशान्त वातावरण में भी ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं ।
मैने सीखा है कि किसी प्रोजेक्ट की योजना बनाते समय छोटी से छोटी पेन्सिल भी बडी से बडी याददास्त से भी बडी होती है ।


परिवर्तन / बदलाव
क्षणे-क्षणे यद् नवतां उपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः । ( जो हर क्षण नवीन लगे वही रमणीयता का रूप है )
 शिशुपाल वध
आर्थिक समस्याएँ सदा ही केवल परिवर्तन के परिणाम स्वरूप पैदा होती हैं ।
परिवर्तन विज्ञानसम्मत है । परिवर्तन को अस्वीकार नहीं किया जा सकता जबकि प्रगति राय और विवाद का विषय है ।
 बर्नार्ड रसेल
हमें वह परिवर्तन खुद बनना चाहिये जिसे हम संसार मे देखना चाहते हैं ।
 महात्मा गाँधी
परिवर्तन का मानव के मस्तिष्क पर अच्छा-खासा मानसिक प्रभाव पडता है । डरपोक लोगों के लिये यह धमकी भरा होता है क्योंकि उनको लगता है कि स्थिति और बिगड सकती है
आशावान लोगों के लिये यह उत्साहपूर्ण होता है क्योंकि स्थिति और बेहतर हो सकती है
और विश्वास-सम्पन्न लोगों के लिये यह प्रेरणादायक होता है क्योंकि स्थिति को
बेहतर बनाने की चुनौती विद्यमान होती है ।
 राजा ह्विटनी जूनियर
नयी व्यवस्था लागू करने के लिये नेतृत्व करने से अधिक कठिन कार्य नहीं है ।
 मकियावेली
यदि किसी चीज को अच्छी तरह समझना चाहते हो तो इसे बदलने की कोशिश करो ।
 कुर्त लेविन
आप परिवर्तन का प्रबन्ध नहीं कर सकते , केवल उसके आगे रह सकते हैं ।
 पीटर ड्रकर
स्व परिवर्तन से दूसरों का परिवर्तन करो.
चिड़िया कहती है, काश, मैं बादल होती । बादल कहता है, काश मैं चिड़िया होता।
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर
दुःखी होने पर प्रायः लोग आंसू बहाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करते लेकिन जब वे क्रोधित होते हैं तो परिवर्तन ला देते हैं।
- माल्कम एक्स
पहले हर अच्छी बात का मज़ाक बनता है, फिर उसका विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है।
- स्वामी विवेकानंद
परिवर्तन ही प्रगति है ।


नेतृत्व / प्रबन्धन
अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
 शुक्राचार्य
कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं ।
मुखिया मुख सो चाहिये , खान पान कहुँ एक ।
पालै पोसै सकल अंग , तुलसी सहित बिबेक ॥
जीवन में हमारी सबसे बडी जरूरत कोई ऐसा व्यक्ति है , जो हमें वह कार्य करने के योग्य बना दे , जिसे हम कर सकते हैं ।
नेतृत्व का रहस्य है , आगे-आगे सोचने की कला ।
 मैरी पार्कर फोलेट
नेताओं का मुख्य काम अपने आस-पास नेता तैयार करना है ।
 मैक्सवेल
अपने अन्दर योग्यता का होना अच्छी बात है , लेकिन दूसरों में योग्यता खोज पाना ( नेता की ) असली परीक्षा है ।
 एल्बर्ट हब्बार्ड
अपर्याप्त तथ्यों के आधार पर ही , अर्थपूर्ण सामान्यीकरण करने की कला , प्रबन्धन की कला है ।
मैं सिर्फ उतने ही दिमाग का इस्तेमाल नहीं करता जितना मेरे पास है, बल्कि वह सब भी जो मैं उधार ले सकता हूँ.
- वुडरो विलसन


निर्णय
हमारी शक्ति हमारे निर्णय करने की क्षमता में निहित है ।
 फुलर
जब कभी भी किसी सफल व्यापार को देखेंगे तो आप पाएँगे कि किसी ने कभी साहसी निर्णय लिया था.
अगर आप निर्णय नहीं ले पाते तो आप बास या नेता कुछ भी नहीं बन सकते ।
नब्बे प्रतिशत निर्णय अतीत के अनुभव के आधार पर लिये जा सकते हैं , केवल दस प्रतिशत के लिये अधिक विश्लेषण की जरूरत होती है ।
निर्णय लेने से उर्जा उत्पन्न होती है , अनिर्णय से थकान ।
 माइक हाकिन्स
काम करने में ज्यादा ताकत नहीं लगती , लेकिन यह निर्णय करने में ज्यादा ताकत लगती है कि क्या करना चाहिये ।
निर्णय के क्षणों मे ही आप की भाग्य का निर्माण होता है ।


विसंगति / विरोधाभास / उल्टी-गंगा / पैराडाक्स
सिर राखे सिर जात है , सिर काटे सिर होय ।
जैसे बाती दीप की , कटि उजियारा होय ॥
 कबीरदास
लघुता से प्रभुता मिलै , कि प्रभुता से प्रभु दूर ।
ची‍टी ले शक्कर चली , हाथी के सिर धूल ॥
 बिहारी
थोडा चुराओ , जेल जाओ ।
अधिक चुराओ , राजा बन जाओ ॥
 बाब डाइलन
लोग आदेश के बजाय मिथक से , तर्क के बजाय नीति-कथा से , और कारण के बजाय संकेत से चलाये जाते हैं ।
कहकर बताने के बहुत से प्रयत्न अत्यधिक कह देने के कारण व्यर्थ चले जाते हैं ।
ज्ञान की अपेक्षा अज्ञान ज्यादा आत्मविश्वास पैदा करता है ।
 चार्ल्स डार्विन
संसार मे समस्या यह है कि मूढ लोग अत्यन्त सन्देहरहित होते है और बुद्धिमान सन्देह से परिपूर्ण ।
 जार्ज बर्नार्ड शा
किसी विषय से परिचित होने का सर्वोत्तम उपाय है , उस विषय पर एक किताब लिखना ।
 डिजराइली
विद्वानो की विद्वता बिना काम के बैठने से आती है ; और जिस व्यक्ति के पास कोई काम नहीं है , वह महान बन जायेगा ।
शब्दो का एक महान उपयोग है , अपने विचारों को छिपाने में ।
वह आदमी अवश्य ही अत्यन्त अज्ञानी होगा ; वह उन सारे प्रश्नों का उत्तर देता है जो उससे पूछे जाते हैं ।
यदि तुम्हारे कोई दुश्मन नही हैं , यह इसका संकेत है कि भाग्य तुमको भूल गयी है ।
कोई खोज जितनी ही मौलिक होती है , बाद में उतनी ही साफ ( स्वतः स्पष्ट ) लगती है ।
आलसी लोग सदा व्यस्त रहते हैं ।
अधिक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के सफल होने की सम्भावना ज्यादा होती है ।
शक्ति के दुख वास्तविक हैं और सुख काल्पनिक ।


कल्पना / चिन्तन / ध्यान / मेडिटेशन
अपनी याददास्त के सहारे जीने के बजाय अपनी कल्पना के सहरे जिओ ।
 लेस ब्राउन
केवल वे ही असंभव कार्य को कर सकते हैं जो अदृष्य को भी देख लेते हैं ।
व्यावहारिक जीवन की उलझनों का समाधा किन्हीं नयी कल्पनाओं में मिलेगा , उन्हें ढूढो ।
 श्रीराम शर्मा आचार्य
कल्पना ही इस संसार पर शासन करती है ।
 नैपोलियन
कल्पना , ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है । ज्ञान तो सीमित है , कल्पना संसार को घेर लेती है ।
 अलबर्ट आइन्स्टीन
ज्ञानात् ध्यानं विशिष्यते ।
( ध्यान , ज्ञान से बढकर है )
ज्ञान प्राप्ति का एक ही मार्ग है जिसका नाम है , एकाग्रता । शिक्षा का सार है , मन को एकाग्र करना , तथ्यों का संग्रह करना नहीं ।
 श्री माँ
एकाग्रता ही सभी नश्वर सिद्धियों का शाश्वत रहस्य है ।
 स्टीफन जेविग
तर्क , आप को किसी एक बिन्दु  से दूसरे बिन्दु  तक पहुँचा सकते हैं। लेकिन , कल्पना , आप को सर्वत्र ले जा सकती है।
 अलबर्ट आइन्सटीन
जो भारी कोलाहल में भी संगीत को सुन सकता है, वह महान उपलब्धि को प्राप्त करता है ।
डा विक्रम साराभाई


चिन्तन / मनन
जब सब एक समान सोचते हैं तो कोई भी नहीं सोच रहा होता है ।
 जान वुडन


स्वतंत्र चिन्तन / चिन्तन की स्वतंत्रता
कोई व्यक्ति कितना ही महान क्यों न हो, आंखे मूंदकर उसके पीछे न चलिए। यदि ईश्वर की ऐसी ही मंशा होती तो वह हर प्राणी को आंख, नाक, कान, मुंह, मस्तिष्क आदि क्यों देता ?
- विवेकानंद
मानवी चेतना का परावलंबन - अन्तःस्फुरणा का मूर्छाग्रस्त होना , आज की सबसे बडी समस्या है । लोग स्वतन्त्र चिन्तन करके परमार्थ का प्रकाशन नहीं करते बल्कि दूसरों का उटपटांग अनुकरण करके ही रुक जाते हैं ।
 श्रीराम शर्मा आचार्य
बिना वैचारिक-स्वतन्त्रता के बुद्धि जैसी कोई चीज हो ही नहीं सकती ; और बोलने की स्वतन्त्रता के बिना जनता की स्वतन्त्रता नहीं हो सकती।
 बेन्जामिन फ़्रैंकलिन
प्रत्येक व्यक्ति के लिये उसके विचार ही सारे तालो की चाबी हैं ।
 इमर्सन
शारीरिक गुलामी से बौद्धिक गुलामी अधिक भयंकर है ।
 श्रीराम शर्मा , आचार्य
ग्रन्थ , पन्थ हो अथवा व्यक्ति , नहीं किसी की अंधी भक्ति ।
 श्रीराम शर्मा , आचार्य
सर्वोत्तम मानव मस्तिष्क की पहचान है , किन्हीं दो पूर्णतः विपरीत विचार धाराऒं को साथ- साथ ध्यान में रखते हुए भी स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता का होना ।
 स्काट फिट्जेराल्ड
आत्मदीपो भवः ।
( अपना दीपक स्वयं बनो । )
 गौतम बुद्ध
इतने सारे लोग और इतनी थोडी सोच !
सभी प्राचीन महान नहीं है और न नया, नया होने मात्र से निंदनीय है। विवेकवान लोग स्वयं परीक्षा करके प्राचीन और नवीन के गुण-दोषों का विवेचन करते हैं लेकिन जो मूढ़ होते हैं, वे दूसरों का मत जानकर अपनी राय बनाते हैं।
- कालिदास


तर्कवाद / रेशनालिज्म / क्रिटिकल चिन्तन
पाहन पूजे हरि मिलै , तो मैं पुजूँ पहार ।
ताती यहु चाकी भली , पीस खाय संसार ॥
 कबीर
कांकर पाथर जोरि के , मसजिद लै बनाय ।
ता चढि मुल्ला बाक दे , क्या बहरा भया खुदाय ॥
 कबीर


मौन
मौन निद्रा के सदृश है । यह ज्ञान में नयी स्फूर्ति पैदा करता है ।
 बेकन
मौनं सर्वार्थसाधनम् ।
 पंचतन्त्र
( मौन सारे काम बना देता है )
आओं हम मौन रहें ताकि फ़रिस्तों की कानाफूसियाँ सुन सकें ।
 एमर्शन
मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक-शक्ति होती है ।
 कार्लाइल
मौनं स्वीकार लक्षणम् ।
( किसी बात पर मौन रह जाना उसे स्वीकार कर लेने का लक्षण है । )
कभी आंसू भी सम्पूर्ण वक्तव्य होते हैं |
- ओविड
मूरख के मुख बम्ब हैं , निकसत बचन भुजंग।
ताकी ओषधि मौन है , विष नहिं व्यापै अंग।।
वार्तालाप बुद्धि को मूल्यवान बना देता है , किन्तु एकान्त प्रतिभा की पाठशाला है ।
 गिब्बन
मौन और एकान्त,आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं ।
 बिनोवा भावे
मौन , क्रोध की सर्वोत्तम चिकित्सा है ।
 स्वामी विवेकानन्द


उपाय / सुविचार / सुविचारों की शक्ति / मंत्र / उपाय-महिमा / समस्या-समाधान / आइडिया
मनुष्य की वास्तविक पूँजी धन नहीं , विचार हैं ।
 श्रीराम शर्मा , आचार्य
मनःस्थिति बदले , तब परिस्थिति बदले ।
- पं श्री राम शर्मा आचार्य
उपायेन हि यद शक्यं , न तद शक्यं पराक्रमैः ।
( जो कार्य उपाय से किया जा सकता है , वह पराक्रम से नही किया जा सकता । )
 पंचतन्त्र
विचारों की शक्ति अकूत है । विचार ही संसार पर शाशन करते है , मनुष्य नहीं ।
 सर फिलिप सिडनी
लोगों के बारे मे कम जिज्ञासु रहिये , और विचारों के सम्बन्ध में ज्यादा ।
विचार संसार मे सबसे घातक हथियार हैं ।
 डब्ल्यू. ओ. डगलस
किस तरह विचार संसार को बदलते हैं , यही इतिहास है ।
विचारों की गति ही सौन्दर्य है।
 जे बी कृष्णमूर्ति
ग़लतियाँ मत ढूंढो , उपाय ढूंढो |
- हेनरी फ़ोर्ड
जब तक आप ढूंढते रहेंगे, समाधान मिलते रहेंगे |
- जॉन बेज


कार्यारम्भ / कार्य / क्रिया / कर्म
ज्ञानं भार: क्रियां बिना ।
आचरण के बिना ज्ञान केवल भार होता है ।
 हितोपदेश
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथै: ।
नहिं सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥
कार्य उद्यम से ही सिद्ध होते हैं , मनोरथ मात्र से नहीं । सोये हुए शेर के मुख में मृग प्रवेश नहीं करते ।
 हितोपदेश
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन् ।
( कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है , फल में कभी भी नहीं )
 गीता
देहि शिवा बर मोहि इहै , शुभ करमन तें कबहूँ न टरौं ।
जब जाइ लरौं रन बीच मरौं , या रण में अपनी जीत करौं ॥
 गुरू गोविन्द सिंह
निज-कर-क्रिया रहीम कहि , सिधि भावी के हाथ ।
पांसा अपने हाथ में , दांव न अपने हाथ ॥
जो क्रियावान है , वही पण्डित है । ( यः क्रियावान् स पण्डितः )
सकल पदारथ एहि जग मांही , करमहीन नर पावत नाही ।
 गो. तुलसीदास
जीवन की सबसे बडी क्षति मृत्यु नही है । सबसे बडी क्षति तो वह है जो हमारे अन्दर ही मर जाती है ।
 नार्मन कजिन
आरम्भ कर देना ही आगे निकल जाने का रहस्य है ।
- सैली बर्जर
जो कुछ आप कर सकते हैं या कर जाने की इच्छा रखते है उसे करना आरम्भ कर दीजिये । निर्भीकता के अन्दर मेधा ( बुद्धि ), शक्ति और जादू होते हैं ।
 गोथे
छोटा आरम्भ करो , शीघ्र आरम्भ करो ।
प्रारम्भ के समान ही उदय भी होता है । ( प्रारम्भसदृशोदयः )
 रघुवंश महाकाव्यम्
पराक्रम दिखाने का समय आने पर जो पीछे हट जाता है , उस तेजहीन का पुरुषार्थ सिद्ध नही होता ।
यो विषादं प्रसहते विक्रमे समुपस्थिते ।
तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न सिद्धयति ॥
- - वाल्मीकि रामायण
शुभारम्भ, आधा खतम ।
हजारों मील की यात्रा भी प्रथम चरण से ही आरम्भ होती है ।
 चीनी कहावत
सम्पूर्ण जीवन ही एक प्रयोग है । जितने प्रयोग करोगे उतना ही अच्छा है ।
 इमर्सन
सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप चौबीस घण्टे मे कितने प्रयोग कर पाते है ।
 एडिशन
उच्च कर्म महान मस्तिष्क को सूचित करते हैं ।
 जान फ़्लीचर
मानव के कर्म ही उसके विचारों की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है ।
 लाक
ईश्वर से प्रार्थना करो, पर अपनी पतवार चलाते रहो.
जो जैसा शुभ व अशुभ कार्य करता है, वो वैसा ही फल भोगता है |
 वेदव्यास
अकर्मण्य मनुष्य श्रेष्ठ होते हुए भी पापी है।
- ऐतरेय ब्राह्मण-३३।३
जब कोई व्यक्ति ठीक काम करता है, तो उसे पता तक नहीं चलता कि वह क्या कर रहा है पर गलत काम करते समय उसे हर क्षण यह ख्याल रहता है कि वह जो कर रहा है, वह गलत है।
- गेटे
उच्च कर्म महान मस्तिष्क को सूचित करते हैं ।
 जान फ़्लीचर
मानव के कर्म ही उसके विचारों की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है ।
 जान लाक
मनुष्य जितना ज्ञान में घुल गया हो उतना ही कर्म के रंग में रंग जाता है ।
विनोबा
सही स्थान पर बोया गया सुकर्म का बीज ही महान फल देता है ।
 कथा सरित्सागर
भलाई का एक छोटा सा काम हजारों प्रार्थनाओं से बढकर है ।


कार्यनीति
एक साधै सब सधे, सब साधे सब जाये
रहीमन, मुलही सिंचीबो, फुले फले अगाय ।
रहीम
जिस काम को बिल्कुल किया ही नहीं जाना चाहिये , उस काम को बहुत दक्षता के साथ करने के समान कोई दूसरा ब्यर्थ काम नहीं है ।
 पीटर एफ़ ड्रूकर
अंतर्दृष्टि के बिना ही काम करने से अधिक भयानक दूसरी चीज नहीं है ।
 थामस कार्लाइल
यदि सारी आपत्तियों का निस्तारण करने लगें तो कोई काम कभी भी आरम्भ ही नही हो सकता ।
एक समय मे केवल एक काम करना बहुत सारे काम करने का सबसे सरल तरीका है ।
 सैमुएल स्माइल


उद्यम / उद्योग / उद्यमशीलता / उत्साह / प्रयास / प्रयत्न
संसार का सबसे बडा दिवालिया वह है जिसने उत्साह खो दिया ।
 श्रीराम शर्मा , आचार्य
अकर्मण्यता का दूसरा नाम मृत्यु है |
- मुसोलिनी
यह ठीक है कि आशा जीवन की पतवार है। उसका सहारा छोड़ने पर मनुष्य भवसागर में बह जाता है पर यदि आप हाथ-पैर नहीं चलायेंगे तो केवल पतवार की उपस्थिति से गंतव्य तट पर थोड़े ही पहुंच जायेंगे।
- लुकमान
आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और उद्यम सबसे बड़ा मित्र, जिसके साथ रहने वाला कभी दुखी नहीं होता ।
 भर्तृहरि


परिश्रम
मैं अपने ट्रेनिंग सत्र के प्रत्येक मिनट से घृणा करता था, परंतु मैं कहता था – “भागो मत, अभी तो भुगत लो, और फिर पूरी जिंदगी चैम्पियन की तरह जिओ” – मुहम्मद अली
कठिन परिश्रम से भविष्य सुधरता है. आलस्य से वर्तमान |
- स्टीवन राइट
आराम हराम है.
चींटी से परिश्रम करना सीखें |
 अज्ञात
चींटी से अच्छा उपदेशक कोई और नहीं है। वह काम करते हुए खामोश रहती है।
- बैंजामिन फ्रैंकलिन
चरैवेति , चरैवेति । ( चलते रहो , चलते रहो )
सूरज और चांद को आप अपने जन्म के समय से ही देखते चले आ रहे हैं। फिर भी यह नहीं जान पाये कि काम कैसे करने चाहिए ?
- रामतीर्थ
जहां गति नहीं है वहां सुमति उत्पन्न नहीं होती है। शूकर से घिरी हुई तलइया में सुगंध कहां फैल सकती है?
- शिवशुकीय


रचनाशीलता / श्रृजनशीलता / क्रियेटिविटी /
खोजना , प्रयोग करना , विकास करना , खतरा उठाना , नियम तोडना , गलती करना और मजे करना , श्रृजन है ।
स्पर्धा मत करो , श्रृजन करो । पता करो कि दूसरे सब लोग क्या कर रहे हैं , और फिर उस काम को मत करो ।
 जोल वेल्डन
वही असम्भव को करने में सक्षम है , जो व्यक्ति बे-सिर-पैर की चीजें (एब्सर्ड) करने की कोशिश करता है ।
रचनात्मक कार्यों से देश समर्थ बनेगा ।
 श्रीराम शर्मा , आचार्य
यदि आप नृत्य कर रहे हों , तो आप को ऐसा लगना चाहिए कि , आप को , देखने वाला कोई भी आस-पास मौजूद नहीं है। यदि आप किसी संगीत की प्रस्तुति कर रहे हों , तो आप को ऐसा प्रतीत होना चाहिये कि , आप की प्रस्तुति पर , आप के सिवा अन्य किसी का भी ध्यान नहीं है । और , यदि आप सचमुच में , किसी से प्रेम कर बैठें हों , तो आप में ऐसी अनुभूति होनी चाहिए , कि , आप पहले कभी भी भावनात्मक तौर पर आहत नहीं हुए हैं।
 मार्क ट्वेन


विद्या / सीखना / शिक्षा / ज्ञान / बुद्धि / प्रज्ञा / विवेक / प्रतिभा /
विद्याधनं सर्वधनं प्रधानम् ।
( विद्या-धन सभी धनों मे श्रेष्ठ है )
जिसके पास बुद्धि है, बल उसी के पास है ।
(बुद्धिः यस्य बलं तस्य )
 पंचतंत्र
स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान सर्वत्र पूज्यते ।
(राजा अपने देश में पूजा जाता है , विद्वान की सर्वत्र पूजा होती है )
काकचेष्टा वकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च |
अल्पहारी गृह्त्यागी विद्यार्थी पंचलक्षण्म् ।|
( विद्यार्थी के पाँच लक्षण होते हैं : कौवे जैसी दृष्टि , बकुले जैसा ध्यान , कुत्ते जैसी निद्रा , अल्पहारी और गृहत्यागी । )
अनभ्यासेन विषम विद्या ।
( बिना अभ्यास के विद्या बहुत कठिन काम है )
सुखार्थी वा त्यजेत विद्या , विद्यार्थी वा त्यजेत सुखम ।
सुखार्थिनः कुतो विद्या , विद्यार्थिनः कुतो सुखम ॥
ज्ञान प्राप्ति से अधिक महत्वपूर्ण है अलग तरह से बूझना या सोचना ।
डेविड बोम (१९१७-१९९२)
सत्य की सारी समझ एक उपमा की खोज मे निहित है ।
 थोरो
प्रत्येक व्यक्ति के लिये उसके विचार ही सारे तालो की चाबी हैं ।
 इमर्सन
वही विद्या है जो विमुक्त करे । (सा विद्या या विमुक्तये )
विद्या के समान कोई आँख नही है । ( नास्ति विद्या समं चक्षुः )
खाली दिमाग को खुला दिमाग बना देना ही शिक्षा का उद्देश्य है ।
- - फ़ोर्ब्स
अट्ठारह वर्ष की उम्र तक इकट्ठा किये गये पूर्वाग्रहों का नाम ही सामान्य बुद्धि है ।
 आइन्स्टीन
कोई भी चीज जो सोचने की शक्ति को बढाती है , शिक्षा है ।
शिक्षा और प्रशिक्षण का एकमात्र उद्देश्य समस्या-समाधान होना चाहिये ।
संसार जितना ही तेजी से बदलता है , अनुभव उतना ही कम प्रासंगिक होता जाता है । वो जमाना गया जब आप अनुभव से सीखते थे , अब आपको भविष्य से सीखना पडेगा ।
गिने-चुने लोग ही वर्ष मे दो या तीन से अधिक बार सोचते हैं ; मैने हप्ते में एक या दो बार सोचकर अन्तर्राष्ट्रीय छवि बना ली है ।
 जार्ज बर्नार्ड शा
दिमाग जब बडे-बडे विचार सोचने के अनुरूप बडा हो जाता है, तो पुनः अपने मूल आकार में नही लौटता । 
जब सब लोग एक समान सोच रहे हों तो समझो कि कोई भी नही सोच रहा ।  जान वुडेन
पठन तो मस्तिष्क को केवल ज्ञान की सामग्री उपलब्ध कराता है ; ये तो चिन्तन है जो पठित चीज को अपना बना देती है ।
 जान लाक
एकाग्र-चिन्तन वांछित फल देता है ।
- जिग जिग्लर
दिमाग पैराशूट के समान है , वह तभी कार्य करता है जब खुला हो ।
 जेम्स देवर
अगर हमारी सभ्यता को जीवित रखना है तो हमे महान लोगों के विचारों के आगे झुकने की आदत छोडनी पडेगी । बडे लोग बडी गलतियाँ करते हैं ।
 कार्ल पापर
सारी चीजों के बारे मे कुछ-कुछ और कुछेक के बारे मे सब कुछ सीखने की
कोशिश करनी चाहिये ।
 थामस ह. हक्सले
शिक्षा प्राप्त करने के तीन आधार-स्तंभ हैं - अधिक निरीक्षण करना , अधिक अनुभव करना और अधिक अध्ययन करना ।
 केथराल
शिक्षा , राष्ट्र की सस्ती सुरक्षा है ।
 बर्क
अपनी अज्ञानता का अहसास होना ज्ञान की दिशा में एक बहुत बडा कदम है ।
 डिजरायली
ज्ञान एक खजाना है , लेकिन अभ्यास इसकी चाभी है।
 थामस फुलर
स्कूल को बन्द कर दो ।
 इवान इलिच
प्रज्ञा-युग के चार आधार होंगे - समझदारी , इमानदारी , जिम्मेदारी और बहादुरी ।
 श्रीराम शर्मा , आचार्य
जिसने ज्ञान को आचरण में उतार लिया , उसने ईश्वर को मूर्तिमान कर लिया |
- विनोबा
बच्चों को शिक्षा के साथ यह भी सिखाया जाना चाहिए कि वह मात्र एक व्यक्ति नहीं है, संपूर्ण राष्ट्र की थाती हैं। उससे कुछ भी गलत हो जाएगा तो उसकी और उसके परिवार की ही नहीं बल्कि पूरे समाज और पूरे देश की दुनिया में बदनामी होगी। बचपन से उसे यह सिखाने से उसके मन में यह भावना पैदा होगी कि वह कुछ ऐसा करे जिससे कि देश का नाम रोशन हो। योग-शिक्षा इस मार्ग पर बच्चे को ले जाने में सहायक है।
- स्वामी रामदेव
जेहिं बिधना दारुण दुःख देहीं। ताकै मति पहिलेहि हरि लेंहीं।।
—–गोस्वामी तुलसीदास
पशु पालक की भांति देवता लाठी ले कर रक्षा नही करते, वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं उसे बुद्धी से समायुक्त कर देते है ।
 महाभारत -उद्योग पर्व
जो जानता नही कि वह जानता नही,वह मुर्ख है- उसे दुर भगाओ। जो जानता है कि वह जानता नही, वह सीधा है - उसे सिखाओ. जो जानता नही कि वह जानता है, वह सोया है- उसे जगाओ । जो जानता है कि वह जानता है, वह सयाना है- उसे गुरू बनाओ ।
 अरबी कहावत
विद्वत्ता अच्छे दिनों में आभूषण, विपत्ति में सहायक और बुढ़ापे में संचित धन है ।
 हितोपदेश
जिस प्रकार रात्रि का अंधकार केवल सूर्य दूर कर सकता है, उसी प्रकार मनुष्य की विपत्ति को केवल ज्ञान दूर कर सकता है ।
 नारदभक्ति
अनन्तशास्त्रं वहुलाश्च विद्याः , अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च ।
यद्सारभूतं तदुपासनीयम् , हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् ॥
 चाणक्य
( शास्त्र अनन्त है , बहुत सारी विद्याएँ हैं , समय अल्प है और बहुत सी बाधायें है । ऐसे में , जो सारभूत है ( सरलीकृत है ) वही करने योग्य है जैसे हंस पानी से दूध को अलग करक पी जाता है )




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