Saturday, 26 July 2014

एक साल, 196 किताबें और पूरी दुनिया

अद्भुत है यह भारत
लंदन की एन मॉर्गन पत्रकारिता और लेखन के अलावा गायन का भी शौक रखती हैं। सोलो सिंगिंग के साथ वह लंदन के कई प्रख्यात गायकों के साथ जुगलबंदी भी कर चुकी हैं। भारत के साथ-साथ वह रेड सी, आर्कटिक सर्कल, टेक्सास जैसे कई जाने-माने क्षेत्रों में अपनी प्रस्तुति दे चुकी हैं। लेकिन, कुछ नया करने की जिद थी। मॉर्गन ने साल भर में दुनिया के सभी देशों की किताबें पढ़ने का फैसला कर लिया। इसके लिए उन्होंने एक किताब पढ़ने के लिए खुद को 1.87 दिन का वक्त दिया। काम कठिन था, लेकिन चुनौती और रोमांच का भी एक मजा होता है। मॉर्गन कहती हैं, `मैं खुद को सारे संसार से जुड़ा मानती रही, लेकिन मेरी बुकशेल्फ अलग ही कहानी बयां करती थी। कुछ ऑस्ट्रेलियाई, दक्षिण अफ्रीकी और भारतीय उपन्यासों को छोड़ दें, तो मेरे पास ज्यादातर किताबें ब्रिटेन और अमेरिका की ही थीं। मेरा दायरा सिर्फ अंग्रेजी लेखकों के इर्द-गिर्द ही घूमता था।
2012 में मॉर्गन ने यह फैसला लिया था। लगभग 200 देशों की किताबें हासिल करना आसान नहीं था। इसके लिए मॉर्गन ने प्लैनेट्स रीडर्सकी मदद ली। वह बताती हैं, `मैंने ए इयर ऑफ रीडिंग द वर्ल्डका ब्लॉग बनाया और पाठकों से सुझाव मांगे कि मुझे कौन-कौन सी किताबें पढ़नी चाहिए। दुनिया भर से लोग मुझे पाठ्यसामग्री से जुड़े सुझाव भेजने लगे। कुछ पाठकों ने अपनी किताबें पोस्ट कर दीं। इसी क्रम में तुर्कमेनिस्तान के एके वेलसेपर, पनामा के जुआन डेविड मॉर्गन जैसे लेखकों ने भी अपनी अप्रकाशित रचनाओं के कुछ हिस्से भेज दिए। इसी बहाने मुझे उन रचनाओं को पढ़ने का मौका भी मिला, जो अधिकतर ब्रिटिश पाठकों को उपलब्ध नहीं थीं। लेकिन फिर भी अनूदित पुस्तकों की कमी की वजह से दुनिया भर की किताबों तक पहुंचना आसान नहीं था।
एन मॉर्गन के लिए पुर्तगाल, कोमोरोस, मैडागास्कर, गिनिया-बिसो और मोजांबिक जैसे छोटे देशों की किताबों को पाना और भी कठिन था। उत्तर पैसिफिक का मार्शल आइलैंड ऐसे इलाकों में शुमार है, जहां लेखन का रिवाज ही नहीं है। इसी तरह नाइजर में पुस्तक लेखन के बजाय विशेष कलाकारों `ग्रायट्रसके जरिए पुरातन इतिहास जिंदा रखा जाता है। ग्रायट्रस कथावाचक के साथ-साथ संगीतकार भी होते हैं। मॉर्गन को हाल ही में आजाद हुए दक्षिण सूडान के साहित्य की भी तलाश थी, जहां लेखन का कोई ठोस रिवाज कभी रहा ही नहीं है।
लेकिन, इन तमाम चुनौतियों के बीच मॉर्गन की मेहनत रंग लाई। कहती हैं, `दुनिया भर की साहित्यिक सामग्री को पढ़ते हुए बहुत सी अप्रत्याशित चीजें मेरे साथ हुईं। ऐसा पहली बार हुआ था, जब मैं कहानी कहने वालों के जेहन में झांक पा रही थी। भूटानी लेखक कुनजेंग चोडेन के साथ मैं सिर्फ उनके देश के मंदिरों की सैर ही नहीं कर रही थी, बल्कि एक स्थानीय बौद्ध धर्म अनुयायी के तौर पर आस्था महसूस कर रही थी। गालसन श्चीनाग की कल्पनाओं के सहारे मैं एक गड़रिए की तरह मंगोलिया की अलताई पर्वत श्रृंखला के ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजर रही थी। इसी तरह अपनी पथ-प्रदर्शक नू नू यी के साथ मैं म्यांमार में एक मध्यलिंगी के रूप में धार्मिक त्योहार का आनंद उठा रही थी।इस तरह का अनुभव हजारों न्यूज रिपोर्ट पढ़ने से भी ज्यादा था। इससे मार्गन लाखों मील दूर बैठे लोगों के करीब पहुंच गईं। भावनात्मक दायरा बढ़ा। सोच भी बहुत हद तक प्रभावित हुई थी। मॉर्गन बताती हैं, `मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं अकेली इंसान नहीं हूं, बल्कि एक पूरे नेटवर्क का हिस्सा हूं, जो पूरी पृथ्वी पर फैला हुआ है। फेहरिस्त में शुमार देश एक के बाद एक बदलते जाते थे। शुरुआत में यह जटिल मानसिक प्रक्रिया थी, लेकिन इसके आगे बढ़ने के साथ हास्य, प्रेम, उम्मीद और डर जैसे कई भाव डूबते-उतराते रहे। निर्जन से लगने वाले इलाके भी मुझे करीब लगने लगे। सच कहूं तो मैंने समझ लिया कि कल्पनाएं ही यथार्थ का निर्माण करती हैं।
अब इस अनुभव के आधार पर मॉर्गन रीडिंग द वर्ल्ड : पोस्टकार्ड्स फ्रॉम माई बुकशेल्फको अंतिम रूप देने में जुटी हैं। हारविल सेकर की तरफ से प्रकाशित हो रही यह किताब 2015 में उपलब्ध हो सकेगी।
लंदन की लेखक, पत्रकार और गायिका एन मॉर्गन ने एक साल में दुनिया के 196 देशों की
किताबें पढ़ीं। अनुभव दिलचस्प रहा था और अब दुनिया भर के लोगों को इनकी पुस्तक रीडिंग द वर्ल्ड: पोस्टकार्ड्स फ्रॉम माई बुक शेल्फका इंतजार है। किताब 2015 में बाजार में आएगी।


भारत के बारे में आप क्या सोचती हैं?

भारतीयों के लिए मेरे मन में बहुत सम्मान और आदर का भाव है। मैंने कुछ साल पहले पश्चिम बंगाल के कोलकाता और कलिम्पोंग की यात्रा की थी और वहां का अनुभव मेरे लिए अद्भुत था। भविष्य में भी मैं भारत के अलग-अलग इलाकों की सैर करना चाहती हूं और यहां का रोचक साहित्य पढ़ना चाहती हूं।

भारत की कौन सी चीजें आपको पसंद हैं ?
ब्रिटेन के बहुत सारे लोगों की भांति मैं भी भारतीय खाने की शौकीन हूं। मुझे कोलकाता जैसे शहरों का कोलाहल अपनी ओर खींचता है। जब भारत ने क्रिकेट वर्ल्ड कप (साल 2011) जीता था, तब मैं वहीं थी। उस समय वहां की गली-गली में हो रहे जश्न ने मुझे खुशी से सराबोर कर दिया। इसके अलावा मैं लता मंगेशकर की प्रशंसक हूं। विश्वबंधुत्व के माहौल में पली-बढ़ी होने की वजह से स्कूल जाने के दौरान ही मैंने उनके गीत सुनने शुरू कर दिए थे। जब मेरी पहली नौकरी लगी, तो मेरी एक सहकर्मी भी अपनी कार में उनके गीत बजाया करती थी। मुझे अच्छा लगेगा, अगर मुझे भारतीय भाषाओं की और ज्यादा कहानियां पढ़ने का मौका मिले।

भारतीय संस्कृति के बारे में आपके क्या विचार हैं?
जब मेरा कोलकाता आना हुआ था, तो मैंने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाओं के सम्मान में आयोजित एक साहित्यिक समारोह में हिस्सा लिया था। इसकी यादें आज भी मेरे जेहन में ताजा हैं।

भारतीय साहित्य पढ़ने के बाद भारतीयों के बारे में आप की विचारधारा बदली?
मैंने हमेशा यह माना है कि भारत एक विशाल देश है और यहां की संस्कृति बहुत समृद्ध है। मैंने एम.टी वासुदेवन नायर की शानदार किताब कलामपढ़ी है। प्रेमचंद, महाश्वेता देवी, शिवाजी सावंत जैसे लेखकों को पढ़ा। इसके अलावा भारतीय साहित्य प्रेमियों से बड़ी संख्या में मिले उपयोगी सुझावों से मुझे अहसास हुआ कि इस देश से कितना कुछ सीखा जा सकता है। वाकई भारत अद्भुत है।

क्या आप भारतीयों को संवेदनशील मानती हैं?
बिल्कुल। मुझे जिन भारतीयों ने किताबें पढ़ने संबंधी सुझाव दिए, वे सभी बहुत उत्साही थे। मुझे नहीं लगता कि एक देश के विशाल जनसमूह का किसी तरह सामान्यीकरण किया जा सकता है, खासतौर पर तब, जब वह भारत जैसा समृद्ध और विविधता से भरा देश हो।
भारत के भविष्य के बारे में आप क्या सोचती हैं?
भारत का प्रभाव पूरी दुनिया में बढ़ रहा है। आने वाले सालों में विश्व पटल पर यह और भी ज्यादा अहम भूमिकाओं में नजर आएगा। सही मायने में यह इसके योग्य भी है। मुझे लगता है कि भारत की आर्थिक तरक्की से वहां की सामाजिक व्यवस्था लाभान्वित होगी।


(साभार- अमर उजाला)

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